मीडिया Now - आज असल में दिन उन लोगों का है जिनके देश भक्ति के जज्बे को मौत भी नहीं डरा सकी

आज असल में दिन उन लोगों का है जिनके देश भक्ति के जज्बे को मौत भी नहीं डरा सकी

medianow 13-04-2021 13:02:37


पंकज चतुर्वेदी / आज  बहुत से पर्व हैं -- सभी लोग अपने अपने धर्म या क्षेत्र के मुताबिक़ बधाइयां दे रहे हैं -- लेकिन आज असल में दिन उन लोगों का है जिनके देश भक्ति के जज्बे को मौत भी नहीं डरा सकी थी. रौलेट एक्ट (काला कानून प्रस्ताव) मार्च 1919 में भारत की ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत में उभर रहे राष्ट्रीय आंदोलन को कुचलने के उद्देश्य से निर्मित कानून था। रौलेट बिल के लागू हो जाने से कई केन्द्रों में हिंसात्मक घटनायें घटित हुई थीं। उन केन्द्रों की घटनाओं के बारे में जानने से पहले उन शहरों के चरित्र, भौगोलिक स्थिति पर संक्षिप्त में प्रकाश डालते हैं।

यह एक सामान्य दृष्टिकोण प्राप्त करने के लिए उपयोगी होगा। दिल्ली भारत की राजधानी थी जिसके कारण इसका अपना ऐतिहासिक और वाणिज्यक महत्व रहा हैं और यही कारण भी था कि उत्तरी भारत आयात के लिए इससे प्रभावित था। दिल्ली में 30 मार्च को घटना शुरू होने के बाद अन्य केन्द्रों को दिल्ली की घटनाओं ने प्रभावित किया जिसमें 10 अप्रैल को अमृतसर, लाहौर, अहमदाबाद, मुम्बई और कलकत्ता में हिंसक दंगे हुए। पंजाब के रणबांकुरों ने ब्रितानी सल्तनत के प्रति नाफरमानी के लिए अपना सबसे पावन दिन चुना - वैशाखी का . पंजाब ने  अमृतसर के जलियांवाला बाग  में एक सभा करने का निश्चय किया.

सभी जानते थे कि उनकी जान खतरे में हैं , १२ अप्रेल  २०१९ को जनरल आई ई एच दायर ने  "घोषणा " शीर्षक से सारे शहर में उर्दू और गुरुमुखी में पोस्टर लगवाए थे  जिसमें चेतावनी थी कि कोई भी व्यक्ति बिना मंजूरी के रात के आठ बजे के बाद बाजार में दिखा तो उसे गोली मार दी जायेगी , एक स्थान पर चार से ज्यादा लोग इकट्ठे नहीं हो सकते, यदि कोई ऐसा करता है तो कड़ी कार्यवाही होगी .(फोटो में पोस्टर ) १२ अप्रेल को दायर १२५ अंग्रेज और ३१० भारतीय सैनिक ले कर शहर में गश्त करता है ताकि दहशत कायम रहे .  

सुल्तानविंड दरवाजे पर बहुत से लोग भीड़ के रूप में एकत्र थे, उसने भीड़ को तितर बितर करने के आधे दिए तो न लोग आते -- बल्कि उसकी खिल्ली उडाई,  उसी के बाद पोस्टर लगवाए गए, ढोल बजा कर मुनादी हुई , ये पोस्टर हाथी गेट, चौक दुल्लो, चौक फुल्लावाला, चौक भबा झंडा सिंह लाहौरी गेट , खैरुद्दीन मस्जिद बाज़ार आदि में चस्पा किये गए. अब शहर में तो खबर थी लेकिन आसपास के गाँवों में इस तरह का सन्देश पहुँचा नहीं और  लोग सुबह से ही जलियांवाला में एकत्र होने लगे.

बैशाखी पर हजारों की संख्या में लोग स्वर्ण मन्दिर गये थे। दोपहर लगभग एक बजे डायर ने सुना कि लोग 4.30 बजे जलियांवाले बाग में सभा करने जा रहे हैं। जनरल डायर को लगभग 4 बजे तक पता चल गया था कि वहां लगभग एक हजार लोग एकत्रित हो चुके हैं और लोगों के आने का सिलसिला अभी भी जारी है। डायर तुरन्त ही तैयार हो गया और अपने सैनिकों की टुकड़ी लेकर जलियांवाला बाग की ओर रवाना हो गया। 

जनरल डायर की मोटर के पीछे कैप्टन ब्रिग्स की मोटर थी तथा ब्रिग्स की कार के पीछे पुलिस की कार थी, जिसमें पुलिस सुपरिटेंडेंट रिहिल और प्लोमर बैठे थे। रास्ते में पांच स्थानों पर चालीस-चालीस सैनिकों की चौकियां बैठायी गयी थी। डायर ने अपनी सेना की समीक्षा की उसकी सेना में 407 ब्रिटिश, 739 भारतीय टुकड़ी, थी 389 ब्रिटिश और 382 भारतीय सेना को पहले से ही कई जगाहों पर लगा रखी थी। उसका सी.आई.डी इंस्पेक्टर जवाहर लाल पहले से ही सादे कपड़ों में बाग के अन्दर मौजूद था। एक सैनिक टुकड़ी जो जनरल डायर के साथ सीधी बाग के अंदर घुसी थी। उसमें 19 सैनिक, 25 बंदूकधारी गोरखा, 25 सिख और 40 सिपाही थे, जिनके पास केवल खुखरियां थी।

जलियांवाला का महज 8 फुट चौड़ा फाटक था जिसके कारण मशीनगनें इस संकरे दरवाजे के अन्दर नहीं ले जाई जा सकती थीं। अतः उन्हें बाहर छोड़कर अंग्रेजी फौज दो पंक्तियों में द्वार के अन्दर घुसी और अन्दर जलियांवाला बाग में बाई और दाई ओर मोर्चें लगाने लगी। उस समय लगभग 20-25 हजार लोग मैदान में मौजूद थे और एक आदमी मंच पर खड़ा भाषण दे रहा था। डायर के आने से पहले हंसराज, अब्दुल अजीज, डा0 गुरबख्श राय, राम सिंह, धान सिंह, अब्दुल माज़िद और ब्रिज गोपीनाथ समेत सात वक्ता बोल चुके थे। डा. किचलू की एक तस्वीर सामने टंगी हुई थी। लोगों को बताया गया था कि डा. किचलू की तस्वीर की अध्यक्षता में आज का जलसा हो रहा है। भाषण हो रहे थे, कविताएं पढ़ी जा रही थीं।

एक वक्ता गोपीनाथ ने ‘फरियाद‘ नामक अपनी उर्दू कविता सुनाई जिसका अर्थ थाः ‘‘अफसर ए आला‘‘ ने आज हमको दी हैं धमकियां कि बाजू काट देंगे हम, परों को नोच लेंगे हम पर हर फ़िजा के बाद, मौसम बहार लाजिम है हुजूर खुद ब खुद निकल आयेंगे पर तब और गुच्छे खिल उठेगें।। सभा चल ही रही थी कि इसी दौरान एक हवाई जहाज ने झंड़ा फहराते हुए जलियांवाला बाग पर बहुत नीचे से उड़ान भरी। जहाज की आवाज सुनते ही भीड़ सहम गई और लोग घबराकर इधर-उधर भागने लगे, परन्तु उन्हें आश्वस्त किया गया कि खतरे की कोई बात नहीं है हवाई जहाज अपना काम कर रहा है और हमें अपना काम करते रहना चाहिए।

उस सभा में दो प्रस्ताव पास किए गये थे। एक प्रस्ताव में सरकार से रौलेट एक्ट वापस लेने की मांग की गई थी और दूसरे में 10 अप्रैल 1919 के गोली काण्ड की निंदा करते हुए मृतकों के सम्बन्धियों से सहानुभूति प्रदर्शित की गई। राजनीतिक कार्यकर्ताओं और ‘वक्त‘ समाचार पत्र के सम्पादक दुर्गादास वैद्य ने सरकार की दमन नीति विषयक तीसरा प्रस्ताव सभा में विचाररार्थ रखा ही था कि भीड़ ने अपने पीछे सशस्त्र सैनिकों को खड़े देखा।

आ गए, आ गए, फौज आ गई की आवाज पूरे मैदान मे फैल गयी थी। बाग के अन्दर डायर अपने फौजी दस्ते के साथ खड़ा हो गया और बिना चेतावनी दिए गोली चलाने का आदेश दे दिया। अगले ही क्षण थ्री नाट थ्री राइफलें गोलियां बरसाने लगी थी। अभी-अभी मंच से वक्ता ने कहा ही था-‘‘भाइयों शान्त रहो। चुपचाप सभा में बैठे रहो। हम निहत्थों को भला कोई क्यों मारेगा‘‘ मगर जब गोलियों की कर्णभेदी आवाज आकाश को कांपने लगी तो वक्ताओं ने कहा- ‘‘घबड़ाओ मत, वह हवाई फायर कर रहे हैं।‘‘ और इस कथन के साथ ही रक्त से लोगों की पेंट और कमीजों का रंगना शुरू हो गया था। 

25 हजार लोगों की शांत और निहत्थी सभा इस अकारण हुए आक्रमण को देखकर स्तब्ध रह गई थी। लोग अपनी जानें बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे परन्तु वह भागकर जाते भी तो कहांघ् उनके बाई निकट ही मकान थे, उनसे कुछ दूरी पर कुंआ था और पीछे सैनिकों की बन्दूकें। वह पूरी तरह से जनरल डायर के बनाये चक्रव्यूह में घिर चुके थे। घटना स्थल पर मौजूद अंग्रेज अफसर ब्रिग्ज के अनुसार- ‘‘प्रत्येक सिपाही ने निःसंकोच लोगों को अपनी गोलियों का निशाना बनाया था। मैने किसी भी सैनिक को हवाई फायरिंग करते हुए नहीं देखा था।‘‘ सैकड़ों लोगों की मृत्यु तो घटना स्थल पर ही हो गई। तमाम व्यक्ति भागती हुई भीड़ के पैरों के नीचे कुचले गये, लोगों की लाशें एक-दूसरे के ऊपर लदी हुई थी। डायर का कहना था कि सभा भंग होने से क्या, जब तक एक भी आदमी दिखाई दे रहा है, गोली चलेगी। 

मृतकों और घायलों से पूरा मैदान भरने लगा था। थोड़ी दूर एक छः फुट ऊंची दीवार थी, उस पर चढ़कर बाहर निकलने की कोशिश में हजारों आदमी जुटे हुए थे। तभी जनरल डायर ने उंगली उठाकर उस दिशा की ओर गोली चलाने का आदेश दिया। दीवार के इस तरफ तो लाशों के ढेर लग ही गए दूसरी ओर भी यही हाल था। जो दीवार पर चढ़ने के प्रयत्न में सफल होकर नीचे गिर जाते थे, वे भीड़ के पैरों से कुचल जाते थे। जिधर-जिधर लोग भागते थे उधर-उधर गोलियां उनका पीछा करती थी। जैसा कि जलियांवाला बाग में एक कुंआ भी था उसमें घबड़ाए हुए लोग कूद पड़े थे फिर तो उसमें कूदने वालों का तांता लग गया जिसकी वजह से पहले कूदने वाले दब कर मर गये थे। दस मिनट तक 1650 राउड गोलियां चलने के बाद 337 आदमी, 41 बच्चे (अंग्रेजों के अनुसार) मारे जा चुके थे, कई सौ घायल थे

इस खून  से लाल मैदान  से शहीदों की यद् में मिटटी एकत्र करने के लिए अगले दिन फिर से वहाँ भीड़ एकत्र  हुई. हाल ही में पंजाब  सरकार ने  जलियावाला बाग में शहीद हुए कोई चार सौ लोगों के नाम पते की सूची जारी की है . मैं चाहता हूँ कि पंजाब के युवा साथी , उस लिस्ट के मार्फत उन शहीद  लोगों के परिवारों के आज के हालात की खोज करें . लिस्ट मेरे पास है . लेकिन बगैर ठोस योजना के कृपया वह मुझसे न मांगे , मेल व सन्देश भेजने में समय खराब होता है. जलियांवाला बाग कांड भारत में आज़ादी की लड़ाई को नई दिशा में ले गया -- क्रांतिकारी करतार सिंह सराभा से ले कर भगत सिंह आज़ाद की पीढ़ी तैयार हुई तो कांग्रेस को भी सता में अधिक भागीदारी के बनिस्पत पूर्ण स्वराज की बात करनी पड़ी 
- लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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