मीडिया Now - कहीं ऐसा न हो जाए कि लम्हों ने खता की थीं सदियों ने सजा पाई

कहीं ऐसा न हो जाए कि लम्हों ने खता की थीं सदियों ने सजा पाई

medianow 15-04-2021 09:58:46


नवीन जैन/इंदौर / कोविड 19 के पहले प्रहार में एक नामवर अखबार की चीख अब फिर कानों में गूंजने लगी है। उक्त समाचार पत्र ने लिखा था कि इस महामारी से उपजी व्यथा को व्यक्त करने के लिए अब हमारे शब्द कोश में शब्द ही समाप्त होने लगे हैं। रोज़ एक जैसे वाक्यों को लिखते लिखते हम लोगो में जड़ता, शून्यता का भाव, व्यर्थता बोध में खोने लगे है। अस्पतालों, और श्मशान घाटों में लोग बीमार, एवं मर रहे हैं, और हम अपने अपने दफ्तरों में। वाकई,अब ऐसे पत्रकार आप से मिलें, तो वे उदास, अवसाद में, और संयमित भाषा में चर्चा करते नहीं मिलेंगे। उन्हें हरेक नेता बहुरूपिया, नकली, डरपोक, और न जाने क्या क्या लगता  हैं। इन नेताओं की हरकतें देखकर हिंदी गीतों के बादशाह स्व. रामावतार त्यागी की एक गीत की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं, हम विधायक की तरह थे स्नान घर में, रोशनी की जवानी जब लुट रही थी, बस एक ही गाँव बचा है रोशनी के नाम पर, कुछ करो कि इस आख़िरी कंडील को सो न दो। दिक्कत यह है, तमाम कुर्सी नशीं सो नहीं गए हैं, बल्कि सोने का नाटक कर रहे हैं। सोते हुए को जगाना गुनाह है, लेकिन इसका नाटक करने वालों को ढोल ताशे बजाकर भी नहीं उठाया जा सकता है। अपने करीब बयालीस साल के अखबारी सफ़ऱ में मैंने कभी लाशें देखीं, कभी मारकाट देखी कभी, मोहल्ले के मोहल्ले फूंकते देखे, अस्पतालों में मारे गए या जख्मी पुरूष औरतें देखी और सुनीं असहाय आदमी औरतों की चीखें, चीत्कारें। तब मैंने यह भी देखा कि आदमी के अंदर बैठा जानवर कैसे बाहर आ जाता है, लेकिन पिछले  एक साल में तो हेडिंग लग रहे हैं, श्मशान घाट में कई घण्टों की कतार लगी, लकड़ियां नहीं बचीं, दिवंगतों की अस्थियों लेने रिशेतदार नहीं आ रहे ,पहले  के दौर में अखबारों में खबर आई थी कि कई किलो अस्थियों का विसर्जन स्थानीय  प्रशासन ने विसर्जित किया था। अब आलम तो इस शेर के मार्फ़त समझ में आ सकता है कि.... ,
सुबह की रेशमी झंकार से डर लगता है,
नींद खुलती है , तो अखबार से डर लगता है।

सवाल यह है कि क्या सरकारों ने मान लिया था कि टीके के उत्पादन से ही उसे कोविड 19 की जंग जीतने में सफलता मिल गई  है ।इस गूढार्थ को सरकारी तंत्र ने पूरी चतुराई ,और वफादारी से वायरल किया।देश में लोकतंत्र है ,लेकिन इन्ही  लोगों के तंत्र को भीड़ तंत्र बनने में कितनी देर लगती है।जो लोग मास्क ,सेनेटराइज़र ,अन्य गाइडलाइंस को बकवास समझते थे ,वही अस्पतालों में वेक्सिनेशन के लिए टूट पड़े । कोई सामाजिक दूरी नहीं ,न ही कोई अन्य सावधनियाँ। दोनों बार वेक्सिनेशन के बावजूद पॉजिटिव केसेस की कमी नहीं  आई है ,बल्कि  बढ़ते ही जाने का ही अंदेशा है। कुछ गपोड़ी लोग कहते हैं ,पहले पॉजिटिव शब्द सुनकर अच्छा लगता था ,अब डर लगने लगता है। जैसे, फ़िल्म शोले का मशहूर डायलॉग था ,जो डर गया ,सो मर गया, लेकिन अब कहा जा रहा है कि डरने में ही भलाई है।एक आंकड़े के अनुसार इसी गति ,और आबादी के आधार पर वेक्सिनेशन होता रहा ,तो ही अगले तीस वर्ष  लग जाएंगे । इसमें आने वाली आबादी को जोड़ लिया जाए ,तो सोचिए कितना समय लगेगा।सरकारी आंकड़ों का खेल बड़ा उलझन भरा ,और डरावना भी  है। मद्य्यप्रदेश कि राजधानी भोपाल  में तीन दिनों में कोविड प्रोटोकॉल के तहत मृत लोगों की संख्या पाँच बताई गई ,जबकि विपक्ष के अनुसार यह संख्या 187 थी । कई लाशें एम्बुलेंस या जमीन पर इतंजार में पड़ी हुई थीं। सनद रहे कि कुछ घण्टों के बाद ही मृत देह से पानी निकलने लगता है ,क्योंकि मानव शरीर में 60 से 70 प्रतिशत पानी होता है।

बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि देश के पहले प्रधानमंत्री स्व . पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने एक बार कुम्भ स्नान में मुख्य अतिथि बनकर जाने का निर्णय ऐन वक़्त पर वापस ले लिया था ,और श्रद्धालुओं से माफी माँग ली थी। क्यों हुआ था ऐसा ? दरअसल ,पण्डितजी को अंतिम समय में लगा कि मैं ,कुम्भ में गया तो हो सकता है ,मुझे देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़े । इसी भीड़ में भगदड़ तक मच सकती है। दुर्भाग्यवश ऐसा कुछ अशुभ हो गया ,तो सबसे पहली जवाबदारी मेरी ही होगी । इसीलिए ,मैं नहीं उपस्थित नहीं पाऊंगा। कई लोग कह सकते हैं कि नेहरूजी पूरी तरह से नास्तिक थे ।इन लोगों की जानकारी के लिए बता देना उचित रहेगा कि पण्डित नेहरू हरदम अपने ब्रीफकेस में  गीता रखते थे।अल्बर्ट आइंस्टीन तक कोई निर्णय लेने के पहले 99 बार सोचते थे। मतलब यह कि महाकुंभ की धार्मिकता को लेकर कोई विरोध नहीं किया जा सकता ,लेकिन 12 वर्ष बाद कुम्भ मेला फिर  जुट जाता ।

तब गंगा या त्रिवेडी स्नान हो जाता। कोरोना ,और मृत्यु में किसे चुना  जाना चाहिए ?अब चारों धाम की यात्राओं के लिए कार्यक्रमों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। क्या उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह की यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि ये यात्राएँ अगले वर्ष भी की जा सकती थी। और ,भगवान के दर्शन का  तो कोई तय मुहूर्त होता नहीं। सारे दिन भगवान के क्या मंगल क्या पीर ,जिस दिन उठे देर से भूखा रहे फ़क़ीर।नए बजट में सिर्फ कोविड 19 वेक्सिनेशन के लिए 30 हज़ार करोड़ रुपए का प्रावधान रखा गया था ,लेकिन पूरा मेडिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर ही रहा सहा ध्वस्त हो गया है।बेड ,ऑक्सीजन ,इंजेक्शन ,वेंटिलेटर डॉक्टर्स ,और पैरा मेडिकल स्टाफ की लगातार किल्लत होती जा रही है।देश में लाखों मरीज रोज डिटेक्ट किए जा रहे हैं। मास्क ,सोशल डिस्टेंस ,सेनेटराइजिंग ,सामाजिक आयोजन ,चुनावी रैलियों ,रोड शो नहीं करके कोरोना की सुनामी को रोका जा सकता था । काफी विलंब हो चुका है ,मग़र जब जब जागो ,तब सवेरा। यदि ऐसा नही हुआ तो कहना पड़ेगा ,लम्हों ने ख़ता की थी ,सदियों ने सजा पाई .
- लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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