मीडिया Now - एक दिन लोग समझेंगे और अपने समाज और अपनी सियासत का मिज़ाज बदलेंगे

एक दिन लोग समझेंगे और अपने समाज और अपनी सियासत का मिज़ाज बदलेंगे

medianow 15-04-2021 11:14:14


उर्मिलेश /  जब Covid19 जैसी भयावह महामारी से निपटने के लिए अपने देश के पास बेहतर और पर्याप्त अस्पताल, डाक्टर और अन्य जरूरी चिकित्सीय सुविधाएं नहीं हैं तो Lockdown, Night curfew या आम बंदी के अलावा सरकारें और क्या करें! हाँ, बीच-बीच में क्रिकेट मैच, धार्मिक आयोजन, मेला, रेला-रैली, रोड शो, मंदिर-मस्जिद विवाद या कुछ नहीं तो राज्यों के या स्थानीय निकायों के चुनाव आदि भी चलते रहेंगे! इस देश के लोगों का बड़ा हिस्सा रंग-बिरंगे नेताओं की लफ्फाजी, धर्म-जात-बिरादरी के चक्रव्यूहो और मंदिर-मस्जिद मसलों पर मगन होता रहेगा. भुलाता रहेगा, अपना असल दुख-दर्द! फिर लोग अच्छे अस्पताल, अच्छे स्कूल और रोजगार की मांग क्यों करेंगे?

महामारी हो या तूफान, हमारे भाग्य-विधाताओं-शीर्ष उद्योगपतियों, सत्ता और समाज के बड़े लोगों का कुछ नहीं बिगड़ेगा. इन सबने अपने लिए इसी धरती पर 'अपने-अपने स्वर्ग' बना रखे हैं. कभी गलती से संक्रमित भी हुए तो उन्हें हमारी-आपकी तरह अस्पताल के बेड, आक्सीजन सिलिंडर, दवा और डाक्टर के लिए न लाइन लगानी है और न गिडगिडाना है! उनके बंगले के एक कोने में ही उनके लिए शुरू हो जायेगा सारी सुविधाओं से सज्जित एक मिनी अस्पताल!---और आप हैं कि इन्हीं को अपना 'भाग्य-विधाता' समझते हैं, इनके लिए जात-धरम के नाम पर एक-दूसरे से लड़ते रहते हैं!

आंख खोलकर देखिये--अस्पतालों के अंदर और बाहर, घरों में या सड़कों पर आज कौन मर रहा है? ये हर जाति-धर्म के आम लोग हैं: गरीब मजदूर-किसान, निम्न मध्यवर्गीय  और मध्यवर्गीय भी! अस्पतालों की भारी कमी अब समझ में आ रही है, यह भी कि लोगों को पंचसितारा लुटेरे अस्पताल नहीं, शासन की तरफ से संचालित अच्छे अस्पताल चाहिए. 

संक्रमण का ये भयानक अंधड़ जब तक नहीं थमता, दवा, अस्पताल या आक्सीजन के अभाव में मरते रहेंगे आम लोग! ये हर जाति और हर धर्म के होंगे! महामारी जाति और धर्म नहीं पहचानती. सिर्फ 'हम भारत के लोग' जाति और धर्म के नाम पर अपना लोकतंत्र चलाते आ रहे हैं-एक दूसरे के प्रति घृणा से भरे हुए. इस घृणा को  राजनीति, निहित स्वार्थ की अन्य शक्तियों और धर्म के ठेकेदारों ने हमारे अंदर 'इंजेक्ट' किया है! इसी वजह से हमने अपने लोकतांत्रिक चुनावों में अच्छे अस्पताल, विद्यालय- विश्वविद्यालय, रोज़गार और अच्छे पर्यावरण को मुद्दा ही नहीं बनाया! हम सब 'घृणा और अज्ञान का इंजेक्शन' लगाने वाले उन चंद शैतानों के इशारों पर नाचते रहे! हम उनका झुनझुना बन गये! हर चुनाव में वे अपनी धुन पर हमें बजाते रहे और हम बजते रहे! 

चिकित्सा-विज्ञानी बता रहे हैं, ये महामारी बहुत जल्दी नहीं जाने वाली है. जायेगी भी तो शायद स्थायी तौर पर नहीं. इसलिए आगे की चुनौतियों का हम सबको सामना करना है. अज्ञान के प्रसारक और घृणा की सुई चुभोने वाले यदा-कदा सिर्फ बयान देते रहेंगे. अचानक अस्पताल नही खड़े हो सकते क्योंकि अस्पताल सिर्फ भवन और बेड नही होते, उनके लिए योग्य चिकित्सक, समर्थ नर्स और उपकरण चाहिए. हमारी आई-गई तमाम सरकारों ने स्वास्थ्य का बजट इतना रखा ही नहीं कि बेहतर स्वास्थ्य संरचना की देशव्यापी-व्यवस्था होती! इसके लिए उन पर दबाव भी नहीं डाला गया. फिलवक्त, जो हालात हैं, उसमें अपना बचाव ही बेहतर विकल्प है.
दुनिया के इतिहास में ऐसे अनेक मौके देखे गये, जब बहुत बुरे दिनों में कुछ बहुत अच्छे विचार सामने आये. उन विचारों ने मनुष्य और उसके समाज को बदला. हम भारत  के लोगों का क्या होगा? क्या इस महामारी और इसके विभिन्न आयामों को हम समझेंगे? इस महामारी की चपेट से जो बचेंगे, क्या वे अपने लोगों की मौत के असल कारणों को आसानी से भूल जायेंगे? क्या कुछ दिनों बाद वे फिर मंदिर-मस्जिद, धर्म-जाति, रिश्वत-दलाली और ठेका-पट्टा की उसी पुरानी दौड़ में शामिल हो जायेंगे? क्या अज्ञानता, स्वार्थपरता, निकृष्ट किस्म की अवसरवादिता, क्रूरता और बेईमानी हमारे समाज़ के बड़े हिस्से की नसों और धमनियों में इस कदर जा चुकी है कि अब कुछ भी बदलने वाला नहीं है? क्या इस अमानवीय वर्ण-व्यवस्था ने 'हम भारत के लोगों' को वास्तविक अर्थो में एक 'समाज' और हमारे मनुष्य को एक 'नागरिक' बनने ही नही दिया? क्या हमारे बीच वास्तविक सामाजिकता और नागरिकता का नवजागरण होगा?

बीते चार दशकों से एक पत्रकार-लेखक के तौर पर अपने देश और समाज को देखने-समझने की कोशिश कर रहा हूं. निस्संदेह, इस सफ़र में कदम-कदम पर क्षोभ और हताशा का एहसास होता रहा है. लेकिन समय-समय पर आशा की चमकदार किरणें भी दिखती रही हैं. इन भयावह दिनों में भी हमने आशा नहीं छोड़ी है! 'हम भारत के लोग' चाहें तो हर चुनौती, कष्ट और महामारी से निपट सकते हैं. हमें विश्वास है, एक न एक दिन लोग समझेंगे और अपने समाज और अपनी सियासत का मिज़ाज बदलेंगे. कुछ प्रदेशों ने तो बदला भी है. हम भारत के लोगों में अपने लिए बेहतर लोकतंत्र हासिल करने की क्षमता है!
- लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं

Comments

Subscribe

Receive updates and latest news direct from our team. Simply enter your email below :