मीडिया Now - हसरत जयपुरी - जिया बेक़रार है...

हसरत जयपुरी - जिया बेक़रार है...

medianow 15-04-2021 12:01:07


वीर विनोद छाबड़ा / 15 अप्रेल 1922 को जयपुर में जन्मे हसरत जयपुरी का असली नाम इक़बाल हुसैन था. शुरुआती तालीम अंग्रेजी में हुई. फिर उर्दू और पर्शियन की जानकारी हासिल की. शेरो-शायरी से ज़ुनून की हद तक का लगाव देखकर उनके दादा फ़िदा हुसैन ने उनके इस फ़न को चमकाया और हवा दी. जुनून और तक़दीर ने हसरत को जयपुर से बंबई शिफ्ट होने पर मज़बूर किया.  यहां ग्यारह रूपए माहवार पे बस कंडक्टरी की. साथ ही मुशायरों में शिरकत करते रहे. उनकी मक़बूलियत बढ़ती रही. एक मुशायरे में जनाब पृथ्वीराज कपूर ने हसरत को सुना.  बेहद मुतासिर हुए. बेटे राजकपूर से सिफ़ारिश की. राज उन दिनों लव स्टोरी 'बरसात' बना रहे थे. शंकर जयकिशन को मौसिक़ी की ज़िम्मेदारी थी. हसरत की क़लम से पहला फ़िल्मी नगमा निकला - जिया बेक़रार है, छायी बहार है, आजा मेरे बालमा तेरा इंतज़ार है.…

उसके बाद हसरत ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. एक के बाद एक यादगार नगमे दिए. इनकी तादाद पांच सौ के करीब बताई जाती है. कहते हैं हर शायर की कामयाबी के पीछे कोई न कोई मोहतरमा ज़रूर होती है. हसरत की गिनती भी इनमें थी.  वो राधा नाम की एक लड़की से बेसाख्ता मुहब्बत करते थे. उनकी नज़र में मुहब्बत किसी भी किस्म की दीवार और सरहद को नहीं मानती, चाहे वो मज़हब ही क्यों न हो. मगर बदकिस्मती से हसरत उससे अपनी बेसाख़्ता मोहब्बत का कभी इज़हार नही कर पाए. हालांकि उसे देने के लिए एक ख़त भी लिखा जो उनकी जेब में ही रह गया. इसे उन्होंने 'संगम' में इस्तेमाल किया - ये मेरा प्रेम पत्र पढ़ के….

इसी तरह ये भी अपने इश्क़ को नज़र किया - तेरी प्यारी-प्यारी सूरत की किसी की नज़र न लगे…(ससुराल). पेरिस में एक हसीना को चमचमाते लिबास में देखा तो बर्दाश्त नहीं हुआ - बदन पे सितारे लपेटे हुए ओ जाने तमन्ना कहां जा रही हो.…(प्रिंस). फिल्मफेयर अवार्ड से उनके दो नग़मे नवाज़े गए - बहारों फूल बरसाओ, मेरा महबूब आया है (सूरज).…आज भी ये दुल्हन के द्वारे लगी बारात का फेवरिट गाना है. और दूसरा - ज़िंदगी इक सफ़र है सुहाना, यहां कल क्या हो किसने जाना…(अंदाज़) - ये नगमा ज़िंदगी को दर्शन की निगाह से देखने वालों को बेहद पसंद है. अलावा इसके - पंख होत तो पिया उड़ आती रे.…(सेहरा)....अहसान तेरा होगा मुझ पर...(जंगली)...इस रंग बदलती दुनिया में इंसान की नीयत ठीक नहीं...(राजकुमार) आदि मक़बूल होने वाले गानों की फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है.   

हसरत और शैलेंद्र दो जिस्म एक जान कहलाते थे. शैलेंद्र ने अपनी 'तीसरी क़सम' के लिए उन्हें न्यौता दिया. हसरत ने उन्हें निराश नहीं किया. बदलते हालात के मद्देनज़र उन्होंने अपनी पीड़ा यों दर्शाई - दुनिया बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनाई…हसरत और शैलेंद्र राजकपूर की पहली पसंद रहे. 'मेरा नाम जोकर' और फिर 'कल, आज और कल' की नाकामी ने राजकपूर को मज़बूर कर दिया कि अपनी टीम को बदलें.  लेकिन हसरत को राजकपूर नहीं भूले नहीं.  'राम तेरी गंगा मैली हो गयी' में उनको फिर बुलाया तो उन्होंने अपनी ख़ुशी यों ज़ाहिर की - सुन साहिबा सुन, प्यार की धुन.…लेकिन इसके संगीतकार रवींद्र जैन से उनकी पटरी नहीं खाई.  

हसरत ने इलज़ाम लगाया कि रवींद्र ने उनके कई नग़मे चोरी किये और स्वरचित बताये.  हसरत की बेगम बहुत सयानी थीं. उन्होंने अपने ख़ाविंद की कमाई बड़े कायदे से इंवेस्ट की. यही वज़ह रही कि ख़राब दौर में भी उनकी ज़िंदगी बड़े मज़े से गुज़रती रही. मौत का दिन मुक़र्रर होता है. 17 सितंबर 1999 को हसरत ने 77 साल की उम्र में इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह दिया.
- लेखक एक नामी फिल्म समीक्षक हैं

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