मीडिया Now - पीएम मोदी की बांग्लादेश यात्रा के मायने?

पीएम मोदी की बांग्लादेश यात्रा के मायने?

Administrator 28-03-2021 18:52:27


नवीन जैन ,स्वतंत्र पत्रकार / पीएम नरेंद्र मोदी द्वारा बांग्लादेश का हाल में किया दौरा पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव को नया को नया आयाम या काफी कुछ नई दिशा  देने वाला  साबित हो सकता है। विशेष बात यह कि पीएम मोदी को एअर पोर्ट पर रिसीव करने बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना भी गईं थी। एक जानकारी के अनुसार बंगाल में मतुआ धर्म मानने वाले समुदाय की संख्या एक करोड़ के पार है। यह आंकड़ा आगामी एसेंबली इलेक्शन को देखते बहुत मायने रखता है। इतिहास को ज़्यादा खंगालने की आवश्यकता नहीं है। जरा सी मेहनत से फिर याद किया जाय, और करवाया जाय तो पता चलेगा कि पश्चिम  बंगाल को आज के पाकिस्तान से अलग करने में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इन्दिरा गांधी की ही, तो एक मात्र निर्णायक भूमिका थी। जब हमारी तीनों सेनाएं मानवता के आधार पर इस नेक काम को अंजाम दे रही थीं, उस दौरान तत्कालीन जग चौधरी अमेरिका सहित योरोपियन देश भी भारत को देखकर आँखे तरेरने लगे थे। अमेरिका ने, तो 1971 के इस युद्ध मे भारत के खिलाफ सातवाँ बेड़ा बंगाल की खाड़ी में उतार दिया था। तब की मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस  बेड़े में आण्विक शभी लगे हुए थे।

अमेरिका ने फरमान जारी कर दिया था कि भारत युद्ध रोक दे। उस दौर में स्व. जनरल याहिया  खान की आज के बांग्लादेश में ऐतिहासिक नरसंहार मचाने वाली तानाशाह हुकूमत थी। इस कत्लेआम की तुलना दक्षिणी अमेरिकी देश रवांडा में हुए नरसंहार से  भी की जाती है। रवांडा में मौत के इस जश्न में करीब एक लाख महिलाओं से बलात्कार किया गया था। बहरहाल। उन दिनों भारत और सोवियत यूनियन के बीच बीस साला शान्ति संधी हो चुकी थी।इसी आधार पर सोवियत संघ खुलकर भारत के समर्थन में आ गया था।तब हमारा यह ऐतिहासिक भरोसेमंद महाशक्ति देश विभाजित नहीं हुआ था, और अमेरिका से किसी मामले में कमतर नहीं बैठता था।आखिरकार उक्त जंग हमने जीती। यह कदाचित उतनी बड़ी उपलब्धि नहीं थी, बल्कि दुनिया आज भी इस तथ्य को याद रखती है कि भारत ने जनरल स्व. अरोड़ा के नेतृत्व में नब्बे हज़ार से अधिक पैदल सैनिक को आत्म समर्पण करने के लिए मजबूर कर दिया था। उस वक्त पाक फौजी दस्तों की कमान जनरल स्व. नियाज़ी ने सम्हाल रखी थी। वैसे,भारत के सेनाध्यक्ष जनरल सैम बहादुर मानेकशॉ थे।

इस तरह की घटना कदाचित न पहले, हुई थी, और न बाद में। तत्काल इन्दिरजी भारत की ही नहीं दुनिया की सबसे शक्तिशाली महिला  नेता बन गईं,।  दुनिया भर के मीडिया ने उन्हें आयरन लेडी का तमगा दे दिया ,जिसे याद रखने वाले आज भी याद रखते हैं। यदि मुहावरे में कहा जाए कि उक्त युद्ध में भारत ने पाकिस्तान की छाती पर मूंग दलते हुए आधुनिक बांग्लादेश का निमार्ण करवाया तो यह  गलत नही होगा। बांग्लादेश भारत की गोद में खेल कूदकर बड़ा हुआ। वहाँ की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने यह, तो अपील नहीं कि पश्चिम बंगाल के चुनावों में बंग निवासियों को भाजपा का समर्थन करना चाहिए। हाँ ,यह अवश्य कहा कि बांग्लादेश, एवं भारत को मिलकर आतंकवादी  कृत्यों, और अमानवीय खतरों के प्रति सतर्क  रहना है। अब यह बताने की फिर क्यों आवश्यकता होनी चाहिए कि आतंकवाद नाम के नाग को सबसे अधिक दूध कौन सा देश पिलाता है। मात्र विरोध के नाम पर अब लोगों ने अक्सर विरोध को पोशीदा बीमारी बना लिया है। ऐसे कुनबे के समर्थक इतने स्मार्ट होते हैं कि कभी बापू, कभी नेहरूजी, कभी इन्दिरजी के विरोध में तोपें तान लेते हैं। इस कुनबे को फ़िर याद दिला देंना चाहिए कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, तथा इन्दिरजी ने जान की कुर्बानी दी थी। खैर, मतुआ का मतलब बंग भाषा में होता है मतवाला। यानी, जो किसी विशेष जाति, वर्ग, वर्ण, एवं धर्म से उठा हो।

इसका एक महासंघ सन 1882 में हरिचंद ठाकुर ने बनाया था। हरिचंद ठाकुर ने इसमें दलितों पिछड़े , अनुसूचित जाति तथा जन जातियों को शामिल करके उनके विकास के लिए आजीवन संघर्ष किया।तब एक नारा प्रचलित हुआ करता था, मुख में नाम, हाथ में काम, और सभी को शिक्षा का अधिकार। इस महासंघठन के लिए कई विद्यालय स्थापित किए गए। जब बंटवारे के बाद आज के पाकिस्तान में हिंदुओं का दमन होने लगा, तो उक्त बिरादरी के लोग अपना वतन छोड़ने को मजबूर हो गए। ये लोग पश्चिम बंगाल के अलावा भारत के अन्य कई इलाकों में बसे। हरिचंद ठाकुर ने जो खुद शूद्र थे, पाकिस्तान की केबिनेट में श्रम एवं कानून मंत्री होकर अपनी बिरादरी के लिए लगातार सक्रियता दिखाई, लेकिन उन्हें भी पश्चिम बंगाल आना पड़ा। यहाँ आकर वे डॉ. अम्बेडकर की रिपब्लिक पार्टी से जुड़ गए।

पीएम नरेंद्र मोदी ने ,पश्चिम बंगाल जाकर  कोई विवादास्पद बयान, तो दिया नहीं। जानकारों का यहाँ तक कहना है कि चुनाव ,तो आते जाते रहैंगे, पर फिलवक्त मान कर चलना चाहिए कि जब इन दिनों हमारे लगभग सभी पड़ोसी देशों से हमारे  रिश्तों की मजबूती पर सवालिया निशान लगे हुए हैं, तो कम से कम सभी से मुंह मोड़ लेना खतरे की घण्टी भी साबित हो सकती है। बांग्लादेश आज भी नहीं भूला है कि भारत ने सन 1971 के कुछ समय पहले  और वहाँ की मुक्ति वाहिनी को भारत ने अपने सैन्य अफसरों द्वारा प्रशिक्षण दिलवाकर उन्हें सम्मान से जीने का अधिकार दिलवाया था। वैसे, भी पीएम नरेंद्र मोदी पहले कार्यकाल में लगभग सौ देशों की यात्रा पर गए थे, जिनमें सबसे अधिक तादाद मुस्लिम देशों की थी। इसी कारण समूचे विश्व मुस्लिम समुदाय में पीएम नरेंद्र मोदी के साथ भाजपा के प्रति नज़रिए में भी फर्क आने के संकेत मिले थे। अतः प्रत्येक संवेदनशील मुद्दे पर राजनीति करना देश की पूरी व्यवस्था की सेहत पर उल्टा असर भी डाल सकता है। है कि नहीं???

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