मीडिया Now - ये देश मेरा भी है, हम सबका है, ये देश किसी के बाप का थोड़ी है!

ये देश मेरा भी है, हम सबका है, ये देश किसी के बाप का थोड़ी है!

medianow 19-04-2021 10:51:11


रूप रेखा वर्मा / बहुत बेचैनी है। इतने तमाम सारे भाव एक साथ दिल में हैं। मन कैसे सम्हाले ! डर है, अब किसकी बारी। इसलिये भी डर है कि अब कितना और नीचे गिरना बाक़ी है। डर, कि अब साझी विरासत और लोकतंत्र के कौन से खंभे के गिरने की बारी है। डर, कि अभी ज़ुबाँ पर कौन से नये पहरे लगने बाक़ी हैं। दुख है, गहरा दुख है, जो इन सभी आशंकाओं से जन्मता है। दुख है उन तमाम लाचार लोगों का जिनके प्रियजनों को न इलाज मिला न एम्बुलेंस न सरकार का पाश्चाताप या शर्मिंदगी । जिन्हें आख़िरी संस्कार के लिये भी लाइन लगानी पड़ी और ज़िंदगी की जद्दोजहद से जो मरने के बाद भी मुक्ति न पा सके। दुख है उन सभी के लिये जो सालों साल इसलिये जेल में हैं कि उन्होंने भी अपने 'मन की बात' कहनी चाही थी और ग़रीब गुरबों की हिमायत की थी और जो ये देख रहे हैं कि यहाँ बलात्कारी और घोटालेबाज़ को ज़मानत और राजनीतिक प्रश्रय मिल सकता है लेकिन मानवाधिकार की बात कहने वाले को नहीं।

क्रोध है उन पर जो लगातार समाज बाँट रहे हैं, साझे जीवन की हर निशानी ख़त्म कर रहे हैं। ग़ुस्सा है उन पर जो जीवन और मौत के संघर्ष को भी धार्मिक चश्मे से देख रहे हैं और समाज के विभाजन की अपनी अकल्पनीय भूख को बेशर्मी से मिटाने में लगे हुये हैं।अचंभा है ये देख कर कि पाखण्ड और जेहालत उस देश में में किस तरह गौरवान्वित हो रहे हैं जिस देश के रैनेसाँ या नवजागरण काल ने पाखंड और जातीय-धार्मिक भेदभाव से जम कर संघर्ष किया था और जो देश विश्वगुरु होने के दावे करता है। अचंभा ये देख कर भी है कि जनता किस तरह अपने विवेक पर ताला लगा कर ऐसे मूर्ख पर भरोसा करती है जो कोरोना से बचाव के लिये गंगा मैया की जादुई शक्ति का ऐलान करता है और शायद उम्मीद करता है कि कोरोना वायरस भी धार्मिक पक्षपात करते हुये  कुछ विशेष धार्मिक अनुष्ठानों को ही प्रभावित करेगा।

दया और तरस है उन पर जिन्होंने आत्मघाती हद तक सोचना बन्द कर दिया है और जिनका जीवन कुछ ख़ास तरह के लोगों से नफ़रत करने और इस नफ़रत के मसीहा कुर्सी चिपकू, वोट बटोरू नेताओं के लिये ताली बजाने तक ही सीमित हो गया है। वो थोड़ी ही दूर खड़ी उस हकीकत को नहीं देख पा रहे कि नम्बर उनका भी आयेगा ताली बजवा लेने के बाद। उनके पैरों की ज़मीन भी खींच ली जाने वाली है कुछ ही देर में। लाचारी लगती है, इतने मैदानों में एक साथ कैसे लड़ा जाये। वो भी विराट चुप्पी के बीच ! और परिवर्तन के ज़्यादातर दरवाजों के संकरे हो जाने की स्थिति में। लेकिन लड़ना तो पड़ेगा। बोलना तो पड़ेगा। ये देश मेरा भी है। हम सबका है। बक़ौल मरहूम राहत इंदौरी, ये देश किसी के बाप का थोड़े है !!
- लेखिका लखनऊ यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर रह चुकी हैं

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