मीडिया Now - जिंदगी इस फटे हुए कपड़े जैसी हो गयी है

जिंदगी इस फटे हुए कपड़े जैसी हो गयी है

medianow 20-04-2021 12:37:39


उर्मिलेश /  जिंदगी इस फटे हुए कपड़े जैसी हो गयी है. पर फटा हुआ कपड़ा मामूली नही है, कम से कम मेरे लिए. इसके साथ बहुत सारी यादें जुड़ी हैं. कल यह बैठते समय अचानक चर्र बोल गयी. मैं अवाक् देखता रह गया. अपना दुख घर में सबके साथ शेयर किया. ज्यादा लोगों ने गंभीरतापूर्वक नहीं लिया और कहा कि पाजामा निकालकर पहन लो या कोई और लुंगी डाल लो! वैसे भी मैं लुंगी गर्मियों में ही यदा-कदा पहनता हूं, घर में ज्यादा वक्त पाजामा या आज के प्रचलित लोअर का इस्तेमाल करता हूं. पाकेट होने से उसमें रूमाल या कोई और वस्तु भी रखी जा सकती है. आप को अभी दुकान पर जाना है तो उसमें रूपये-पैसे, गाड़ी की चाभी और सैनेटाजर का छोटा पैक भी रखा जा सकता है! 

पर ये लुंगी मेरे लिए असाधारण परिधान है. इस पर मेरा नाम नहीं सिला है बस, मेरा प्यार सिला है! इसलिए, यह इतनी साधारण नहीं कि मैं इसे यूं ही उतार कर फेंक दूंगा! इसे मैने सन् 1997 में केरल से तमिलनाडु में घुसते वक्त नागरकोइल या नागरकोविल नामक कस्बे में खरीदा था. घर के सभी लोगों के लिए कुछ न कुछ खरीदा. वहां का वह बहुत बड़ा और मशहूर कपड़ा स्टोर था. वह तमिलनाडु और केरल के लोगों के अपने कपड़ों और पहनावों से भरा हुआ था. उन कपड़ों का उत्पादन भी तमिलनाडु के ही उपक्रमों में हुआ था. वह केरल की मेरी पहली और तमिलनाडु की दूसरी यात्रा थी. तमिलनाडु पहली बार छात्र जीवन में गया था. तब मैं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय(JNU) में पीएचडी कर रहा था. चाहते हुए भी उस वक़्त केरल नहीं जा सका. 

सन् 1997 में पहला मौका मिला केरल जाने का. संभवतः वह अक्तूबर का महीना था. वहां का मौसम भी बहुत अच्छा था. केरल प्रवास का वह भी कोई मामूली मौक़ा नहीं था, भारत दौरे पर आ रहीं क्वीन एलिजाबेथ Queen Elizabeth के कोच्चि के खास-खास कार्यक्रमों को कवर करना था. तब मैं 'हिन्दुस्तान' अखबार के दिल्ली दफ़्तर में काम करता था और उसके नेशनल पोलिटिकल ब्यूरो में प्रधान संवाददाता था. कुछ ही समय पहले अखबार के पंजाब ब्यूरो(चंडीगढ़) से स्थानान्तरित होकर दिल्ली आया था. बरसों बाद दिल्ली वापसी हुई थी. विमान और हेलिकॉप्टर की यात्राएं कर चुका था लेकिन इतनी लंबी विमान-यात्रा पहली बार कर रहा था. 

कोच्चि पहुंचकर सबसे पहले तो मैने अपने लिए वहां के प्रशासन द्वारा जारी किये जाने वाले विशेष प्रेस कार्ड आदि का प्रबंध किया. इसमें मलयालम के मशहूर अखबार 'मातृभूमि' के तत्कालीन स्थानीय ब्यूरो प्रमुख सहीद साहब और स्टेसमैन की एक महिला संवाददाता(जिनका नाम भूलने के लिए क्षमाप्रार्थी हूं) ने मेरी मदद की. कलक्टर साहब ने सारे ब्योरे देखने के बाद मेरा कार्ड बनवा दिया. अगले दिन क्वीन एलिजाबेथ वहां आने वाली थीं. उनके ज्यादातर कार्यक्रम सुबह से शुरू होकर लंच के समय से पहले खत्म हो जाने वाले थे. सबसे पहले वह एक विशाल चर्च गयीं. उसी जगह हम पत्रकारों को उनके कुछ नजदीक जाने और कुछ बात करने का मौका मिला. वह बहुत कम बोलीं पर बहुत सहज और खुश दिख रही थीं. उनके कार्यक्रमों को 'कवर' करने के बाद मैने केरल घूमने और वहां के जन-जीवन पर लिखने का फैसला किया. इसके लिए दफ़्तर से पहले ही इजाजत ले ली थी. संपादक जी को अपनी कुछ संभावित स्टोरीज़ की सूची भेजता रहता था. 

एक दिन कन्याकुमारी से लौटते हुए नागरकोइल या नागरकोविल पहुंचा. बिल्कुल पास था. केरल की तरफ से चलिये तो वह तमिलनाडु का गेट-वे है. अपनी यह प्यारी लुंगी मैने वहीं खरीदी. क्या गजब का कपड़ा इसका, बिल्कुल गफ्फ और कोमल! काश, इस पर उस फैक्ट्री का नाम भी कहीं अंकित होता, जहां ऐसी लुंगियों का उत्पादन होता था ! तमिलनाडु या केरल में एक से बढ़कर एक सुंदर लुंगी/धोती दुकानों पर दिखती हैं. पर मुझे नहीं मालूम, अब इस क्वालिटी की लुंगियां बाज़ार में आ रही हैं या नहीं? 

केरल और तमिलनाडु उसके बाद कई बार गया पर प्रोफेशनल-कामकाज में व्यस्तता के चलते नागरकोविल ज्यादा नहीं गया. सिर्फ एक बार कन्याकुमारी से होते हुए उधर से गुजरा तो गाड़ी रुकवाई. लेकिन उस दुकान को खोज नही पाया. उसका नाम भी नहीं याद था कि किसी से पूछता. दिल्ली के खड्ग सिंह मार्ग के स्टेट इम्पोरियम में भी अच्छी अच्छी साड़ियां और लुंगिया बिकती हैं. पर यकीं कीजिये, मैने इतनी प्यारी, गफ्फ और कोमल सूतों से बनी लुंगी आज तक नही देखी. 

हो सकता है, यह मेरा भ्रम हो या अपनी लुंगी को लेकर दीवानगी कि मुझे इससे सुंदर दूसरी कोई नहीं दिखी! बहरहाल, मैने तय कर लिया है, इसके फटने के बावजूद, सन् 1997 की अपनी इस प्यारी लुंगी को मैं अलविदा नहीं कहने वाला. इसे आज धोकर रख दूंगा. सिलकर काम में आने लायक हुई तो ठीक वरना इसके अलग-अलग टुकड़े करके अपने पढ़ने की मेज की दराज में रख लूंगा. इसके कुछ टुकड़े मुंह-हाथ पोछने के काम आयेंगे और कुछ डस्टर बन जायेंगे. पर मैं इसे डस्टबिन में हरगिज़ नही फेंकूगा! आखिर हम अपनी फ़टी हुई बेहाल-सी जिंदगी को आज सहेज रहे हैं न! जिंदगी जिंदाबाद!
- लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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