मीडिया Now - हुस्नलाल-भगतराम और शंकर-जयकिशन की कहानी

हुस्नलाल-भगतराम और शंकर-जयकिशन की कहानी

Administrator 22-04-2021 13:16:31


वीर विनोद छाबड़ा / एक छोटा सा दिलचस्प वाक्या पेश है जिससे पता चलता है नियति के खेल कितने निराले और क्रूर हैं. हुस्नलाल-भगतराम के आर्केस्ट्रा में शंकर नाम का नौजवान सहायक होता था. उसे संगीत का अच्छा ज्ञान था. वो अच्छा गाता भी था और ढोलक तो बहुत ही अच्छी बजाता था. प्यार की जीत (1948) में शंकर ने तीनों ही काम किये. बहुत कामयाब फिल्म रही. बाद में शंकर ने एक और नौजवान जयकिशन के साथ शंकर-जयकिशन संगीतज्ञ जोड़ी बना ली. जैसे-जैसे ये जोड़ी क़ामयाबी के शिखर पर चढ़ती रही हुस्नलाल-भगतराम परली तरफ से नीचे उतरते चले गए. बरसों बाद दोनों में बिखराव हुआ. दुर्दिन के दिन आये. उस वक़्त भगतराम को अपने कभी चेले रहे शंकर के शंकर-जयकिशन के आर्केस्ट्रा में हारमोनियम बजाना पड़ा.  

नयी पीढ़ी ने शायद जालंधर में जन्मे हुस्नलाल-भगतराम का नाम नहीं सुना होगा. चालीस और पचास के सालों में मशहूर संगीतकार जोड़ी थी पं.हुस्नलाल-भगतराम. फ़िल्मी दुनिया की पहली संगीतकार जोड़ी. आपने उनकी बनायीं धुनें ज़रूर सुनी होंगी - चुप चुप खड़े हो ज़रूर कोई बात.…वो पास रहें या दूर रहें दिल में समाये रहते हैं.…मांगी मोहब्बत पायी जुदाई…तेरे नैनों ने चोरी किया मेरा छोटा सा जिया…ओ दूर जाने वाले…एक दिल के टुकड़े हज़ार हुए कोई यहाँ गिरा कोई वहां गिरा…जो दिल में ख़ुशी बन कर आये…दो दिलों को दुनिया मिलने नहीं देती…आंखों में आंसू होटों पे फरयाद ले चले.…क्या बताएं कि मोहब्बत की कहानी क्या है... अपना ही घर लुटाने दीवाना जा रहा है.…बिगड़ी बनाने वाले…पास आके भी हम दूर हुए.…आंख का तारा प्राणों से प्यारा …
और राजेंद्र कृष्ण का लिखा रफ़ी की आवाज़ में सबसे प्यारा ये गैर-फ़िल्मी गाना कौन भला भूल सकता है - सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों बापू की ये अमर कहानी…रिकॉर्ड के लिए नोट किया जाए कि ये गाना गांधी जी की मृत्यु के 48 घंटे के भीतर लिखा और कंपोज़ किया गया था. 

सुप्रसिद्ध संगीतकार पंडित अमरनाथ के छोटे भाई होते थे हुस्नलाल और भगतराम.  इन दोनों का जन्म क्रमशः 1914 और 1920 में हुआ.  हुस्नलाल वॉयलिन के और भगतराम हारमोनियम के एक्सपर्ट थे. पं.दिलीप चंद्र वेदी से संगीत की ट्रेनिंग ली. 1944 में 'चांद' से हुस्नलाल-भगतराम की जोड़ी संगीत की दुनिया के नक्षत्र पर उभरी.  एक रिकॉर्ड बना - भारतीय सिनेमा की पहली संगीतकार जोड़ी.  इनका सफ़र 1949-50 में पीक पर रहा. इस दौरान 19 फ़िल्में की. लेकिन इसके बाद शंकर-जयकिशन, सी.रामचंद्र, ओपी नैय्यर आदि के आगमन से उनकी बुलंदी पहले जैसी नहीं रही. सफ़र की रफ़्तार बहुत धीमी हो गई. बी और सी ग्रेड की फ़िल्में भी करनी पड़ी. और साठ का दशक आते-आते इनका सितारा गर्दिश में डूब गया. आपसी विवाद भी इसका एक प्रमुख कारण बना. 

हुस्नलाल दिल्ली चले गए और भगतराम बंबई में रह कर छोटा-मोटा काम करने लगे. इन्होने लगभग 57 फ़िल्में की. कुछ प्रमुख हैं - मीना बाज़ार, मिर्ज़ा-साहिबां, अफ़साना (बीआर चोपड़ा की पहली फिल्म), अमर कहानी, अप्सरा, प्यार की जीत, सनम, बड़ी बहन, बालम, अदल-ए-जहाँगीर, छोटी भाभी आदि.  
अपना वक़्त खत्म हो जाने के बाद हुस्नलाल दिल्ली आ गए. पहाड़गंज में एक कमरा किराये पे लेकर रहने लगे. 28 दिसंबर 1968 की सुबह मॉर्निंग वॉक से लौट रहे थे. हार्ट फेल हो गया. राहगीर उन्हें अस्पताल ले गए. डॉक्टर ने मुआइना किया और रिपोर्ट में लिखा - लावारिस.  ब्राट डेड. 1973 में भगतराम की भी अनाम मृत्यु हो गई. न कोई ख़बर छपी और न शोक सभा हुई.  दो भाइयों का सफ़र ख़त्म हुआ, अलग अलग.  
- लेखक एक नामी फ़िल्म समीक्षक हैं

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