मीडिया Now - हम माफ़ नहीं कर पाये हैं शत्रु को

हम माफ़ नहीं कर पाये हैं शत्रु को

medianow 26-04-2021 17:42:59


वीर विनोद छाबड़ा /  1971 की बात है. हम बंबई गए थे. तब मुंबई नहीं होती थी बंबई. ईरादा था घूमने और देखने का कि कैसे स्ट्रगल करते हैं यहां लोग. अपने मित्र नीलरतन के घर ठहरे थे. नीलरतन भी वहां एक्टर बनने के चक्कर में गया था. उसके दो भाई वहां नौकरी करते थे. यों हम भी उन दिनों ताज़ा ताज़ा ट्वेंटी प्लस के नौजवान हुए थे और देखने में भी ठीक-ठाक थे. बहरहाल, उस दोपहर बैंडस्टैंड हम नीलरतन के साथ टहल रहे थे. नील रतन ने बताया कि सामने ये जो ऊंची बिल्डिंग देख रहे हो, इसमें कई एक्टर रहते हैं. इसी में एक नाम शत्रुघ्न सिन्हा का भी है. 

यह सुनते ही हमारा दिल मचल उठा - वो अपना बिहारी. तब तक हम शत्रुघ्न सिन्हा को साजन, चेतना, प्रेम पुजारी आदि कुछ फिल्मों में देख चुके थे. 'खिलौना' में तो वो बाक़ायदा विलेन था - बिहारी. रोल बड़ा नहीं था लेकिन बहुत इम्प्रेस किया था उसने. नीलरतन ने हमारे चेहरे पर चमक देखी - चलो मिलते हैं बिहारी से.
हमने कहा - मज़ाक करते हो यार. हमसे क्यों मिलेगा बिहारी बाबू? 

नीलरतन अड़ गया - अभी इतने बड़ा एक्टर नहीं है बिहारी बाबू कि मिलने से मना कर दे. उससे बोलेंगे, आख़िर इतनी दूर लखनऊ से मिलने आये हैं. और ये भी नहीं मालूम कि घर पर है भी कि नहीं. चलो, चांस लेते हैं.  थोड़ी देर बाद ही हम शत्रुघ्न सिन्हा के फ्लैट के सामने खड़े हो थे. दिल में धुक-धुक हो रही थी. अपने बिहारी बाबू से मिलने जा रहे हैं... तब तक हमें नहीं मालूम था कि कल ये बिहारी बाबू स्टार विलेन बन जाएगा और फिर हीरो भी. बहरहाल, नीलरतन ने बेल का बटन दबाया. कुछ पल इंतज़ार किया. दरवाज़ा खुला. एक लम्बा-चौड़ा सांवले रंग का डरावनी शख़्सियत का आदमी. शायद बॉडी गार्ड है शत्रु का. उसने बड़ी बेरुखी से पूछा - क्या है? 
नीलरतन ने कहा - शत्रु जी से मिलने आये हैं. 
उसने टका सा जवाब दिया - साहब घर पर नहीं हैं. शूटिंग पर गए हैं. 
यह कह कर वो दरवाज़ा बंद करने जा ही रहा था कि नीलरतन ने पैर अड़ा दिया - हम इतनी दूर लखनऊ से खासतौर पर मिलने आये हैं. उनसे बोल दो प्लीज़.

बॉडी गार्ड को तरस आ गया - ठीक है. बोलता है. यहीं खड़े रहो. 
एक मिनट न गुज़रा था कि शत्रुघ्न सिन्हा आ गए. दुबला-पतला बांका जवान. हम दोनों ने उन्हें नमस्ते की और बताया कि लखनऊ से आये हैं, आपसे ख़ास मिलने....इससे आगे हमें कुछ कहने का मौका ही नहीं मिला. बिहारी बाबू ने सटाक से दरवाज़ा बंद कर दिया.अगर हम एक सूत भी आगे होते तो यकीनन हमारी नाक टूट जाती. शुक्र है वो एक पल्ले वाला दरवाज़ा था. अगर दो पल्ले वाला होता तो हो सकता है हमारी नाक का उसमें फंस कर कचूमर बन जाता. 
हमने और नीलरतन ने एक-दूसरे का मुंह देखा. कैसा सूखा आदमी है यह? ज़रा भी तमीज़ नहीं. गंगा-जमुनी तहज़ीब और इल्मो-अदब के मरकज़ लखनऊ में पले-बड़े हम दोनों का दिल टूट गया. क़सम खायी कि कितना भी बड़ा स्टार विलेन क्यों न जाए शत्रु, नहीं देखेंगे इसकी फ़िल्म. 

हम टूटा दिल लिए अगली शाम ट्रेन से लखनऊ के लिए वापस हो लिए. 
थोड़े दिन बाद एक फ़िल्म आई - गैंबलर. देवानंद, ज़ाहिदा, सुधीर और मुख्य विलेन जीवन. लेकिन चर्चा ज्यादा हो रही थी छोटे विलेन शत्रुघ्न सिन्हा की. हम न चाहते हुए इसलिए इसे इसलिए दिखने चले गए कि ये अपने फेवरिट देवानंद थे उसमें. सच बताऊं मूवी देख कर हम कायल हो गए बांके बिहारी के किरदार में शत्रु को देख कर. कमाल की एक्टिंग थी. जिस अंदाज़ में उसने हत्या के जुर्म में फंसे देवानंद को बचाने के लिए जुर्म कबूला, वो देखने के काबिल था. सिनेमा हाल तालियों से गूँज उठा. ताली बजाने वालों में हम भी थे. 

बस उस दिन से हम 'शत्रुघ्न सिन्हा एक्टर' के फैन हो गए. शायद ही कोई फ़िल्म छोड़ी हो हमने उसकी. लेकिन उस बिहारी बाबू को हम आज भी माफ़ नहीं कर पाये हैं, जिसने हमारे मुंह पर सटाक से दरवाज़ा बंद किया था और हमारी नाक टूटते टूटते बची थी. 
- लेखक एक नामी फिल्म समीक्षक हैं

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