मीडिया Now - बैटरी बेचता भगवान और बेशर्म फरिश्ते!

बैटरी बेचता भगवान और बेशर्म फरिश्ते!

medianow 27-04-2021 22:06:33


सुशील उपाध्याय / क्रिकेट के भगवान और भारत मां के रत्न एक निजी कंपनी की बैटरी बेचते घूम रहे हैं। क्रिकेट के फरिश्ते आईपीएल के मैचों में नोट बरसाते चौके-छक्के लगा रहे हैं। क्या अद्भुत नजारा है! इन स्टेडियमों के बहार से सायरन बजाती हुई मजबूरी की उद्घोषणाएं जा रही हैं और हम लानत की चादर ओढ़ कर सोए हुए हैं। इन्हीं में से एक विदेशी खिलाड़ी अपनी फीस का कुछ हिस्सा सरकार को दे देता है ताकि परेशानी में पड़े लोगों की मदद हो सके। इन्हीं में से ज्यादातर देशी खिलाड़ी देश भर से मिल रही लानतों से बेखबर हैं। उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि देश में कोरोनो के 3 लाख नए मामले आएं या 5 लाख। इनके लिए जिंदगी अनवरत चलने वाला मनोरंजन है, चलते रहना चाहिए!

यह अमीरों का खेल है। इस पर बहुत ऊंचे दांव लगे हुए हैं। इसमें करोड़ों रुपए का वारा-न्यारा होना है इसलिए इस बेहयाई पर लिखे जाने वाले लेखों और टिप्पणियों की संख्या बेहद सीमित है। बस, इतनी ही राहत है कि विरोध के स्वर मौजूद हैं, भले ही वे कम संख्या में हों।व्यापारी, व्यापार करता है। उसे कोई नहीं रोक सकता, लेकिन जब चारों तरफ दर्द फैला हो। लोगों को जिंदा रहने के लिए अस्पतालों के बाहर गिड़गिड़ाना पड़ रहा हो  तब कोई रेशमी रुमाल, इत्र और गुलदस्ते बेच रहा हो, सपने बेच रहा हो तो फिर क्या किया जाए और क्या कहा जाए! मुझे अभी जानकारी नहीं है कि करोड़ों में बिकने वाले क्रिकेटरों ने इन कठिन हालात में देश की, अपने राज्य की, अपने शहर या इलाके के लोगों की कितनी मदद की होगी ? यदि की होती तो उनकी पीआर एजेंसी इसे मीडिया माध्यमों तक जरूर पहुंचाती। यानी अभी सन्नाटा ही है।

भारत में क्रिकेट की दुनिया की अमीरी, क्रिकेट खिलाड़ियों के जलवे, आम लोगों में उनके प्रति भक्ति-भाव, उनकी पहुंच-पहचान से पूरी दुनिया वाकिफ है, लेकिन अब उनकी बेशर्मी का नया चेहरा भी उभर कर सामने आ रहा है। कुछ लोग कह रहे हैं कि इन दिनों आईपीएल होने से लोगों को राहत मिल रही है, उनका कुछ देर के लिए ही सही, लेकिन थोड़ा ध्यान तो बंट ही रहा है। लेकिन मुझे इस तर्क में दम नजर नहीं आता। जब भी आईपीएल मैचों की खबरें आती हैं तो ऐसा लगता है कि कोई हमारा मजाक बना रहा है। 

वास्तव में, केवल मैं नहीं, मेरे जैसे लाखों लोग इस विराट आयोजन की राह में पलक-पांवडे बिछा कर रखते यदि यह आयोजन चैरिटी के लिए हुआ होता। यदि इससे कुछ वेंटिलेटर, कुछ हॉस्पिटल बेड, कुछ ऑक्सीजन सिलेंडर या कुछ मेडिकल फैसिलिटी मिल पाती, लेकिन आईपीएल चैरिटी नहीं है, ना ही बीसीसीआई कोई धर्मादा संस्था है। सबने पैसा लगाया है इसलिए सब पैसा कमा रहे हैं। चाहे वह किसी निजी कंपनी की बैटरी बेचकर आता हो या फिर ऑनलाइन क्रिकेट के ठगी-केंद्रित धंधे की खुलेआम मार्केटिंग करने से आता हो। फिर अस्पताल बनाने और उन्हें चलाने के बारे में कौन सोचे!

इस वक्त आप देख रहे होंगे कि देश के जाने-माने क्रिकेटर कई ऐसी कंपनियों का प्रचार कर रहे हैं, जिनमें ऑनलाइन फाइनैंशल फ्रॉड की जबरदस्त आशंका मौजूद है। संबंधित विज्ञापनों के अंत में केवल एक लाइन कह देने से कि इस खेल में वित्तीय जोखिम मौजूद है, इनकी मार्केटिंग करने वालों की जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती। ये सब कुछ हमारे आसपास ही चल रहा है। हमारे घर के भीतर, हमारे टीवी चैनलों पर चल रहा है। एक तरफ अस्पतालों और श्मशान घाटों के बाहर बिलखती भीड़ है और दूसरी ओर आईपीएल की रोशनी से नहाई दुनिया है। ये विरोधाभास ही कटु सच है।

हममें से ज्यादातर लोगों को याद होगा कि बीसीसीआई के चेयरमैन कौन हैं, उसके सचिव कौन हैं और सवाल उठाने वाले और न उठाने वाले कौन हैं! दुनिया के बहुत सारे क्रिकेट खिलाड़ी इस बात पर आश्चर्य कर रहे हैं कि जब लोग एक अदद अस्पताल बेड के लिए तड़प रहे हैं, न ऑक्सीजन मिल रही है न दवाएं उपलब्ध हैं। तब एक पूरा समूह किसी भी सूरत में आईपीएल को कराने पर आमादा है और उसे नियमों का एक संपूर्ण आवरण प्राप्त है। उनकी निगाह में भी ये इंतेहा ही है।

ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ी पैट कमिंस द्वारा दिए गए 50 हजार डॉलर भले ही बहुत बड़ी राशि ना हो, लेकिन यह उन लोगों को आईना दिखाने के लिए काफी है जो हर साल कई सौ करोड़ कमाने के बावजूद अभी तक शायद यही सोच रहे हैं कि उन्हें दान करना भी चाहिए या नहीं।वैसे, उनकी जानकारी के लिए यह तो बताया जा सकता है कि पीएम केयर्स फंड अभी एक्टिव है। आप भारत सरकार को ना करना चाहें तो पीएम केयर्स में ही कर दीजिए। शायद भविष्य में यहां से मिलने वाला रिटर्न अब की गई मदद से कई गुना ज्यादा ही होगा। यह हम सभी के लिए आंख खोलने वाला वक्त है। सबक सीखने का वक्त है। हमें नकली भगवानों और झूठे राष्ट्र-रत्नों की नहीं, बल्कि मजबूत सरकारी सिस्टम और सुविधाओं की जरूरत है।

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