मीडिया Now - उसूल की बात

उसूल की बात

Administrator 28-04-2021 11:08:39


वीर विनोद छाबड़ा / राजेंद्र कुमार पचास और साठ के सालों के हिट हीरो होते थे.  फिल्म सर्किल में उनकी पहचान 'जुबली कुमार' के नाम से थी.  देवेंद्र गोयल की 'वचन' (1956) बतौर हीरो उनकी पहली फ़िल्म थी. फिल्म का प्रीमियर तय हुआ. राजेंद्र कुमार बहुत खुश थे. खुश होने का एक कारण ये भी था कि उनके सामने नायिका जानी-मानी गीताबाली थीं.  देवेंद्र गोयल ने राजेंद्र कुमार से पूछा - तुम्हें अपनी फ़ैमिली या दोस्तों के लिए कितनी सीट चाहियें? 

राजेंद्र कुमार ने सोचा कॉम्प्लीमेंट्री होंगी यानी मुफ़्त का ऑफर है. उन्होंने बड़ा सा मुंह खोल दिया - दस सीटें.  गोयल साहब ने कहा - ओके. राजेंद्र कुमार अपनी फैमिली और ख़ास दोस्तों संग पहुंचे.  सबने पिक्चर खूब एन्जॉय की. राजेंद्र कुमार की एक्टिंग की भी वाह-वाह हुई. राजेंद्र कुमार फूल कर कुप्पा हो गए. कुछ दिन बाद उन्हें गोयल साहब के अकाउंटेंट ने बुलाया - अपना फूल एंड फाइनल मेहनताना ले लें. राजेंद्र कुमार ख़ुशी ख़ुशी तुरंत पहुंचे. लेकिन जब पैसा गिना तो कुछ कम था. उन्होंने पूछा - ऐसा क्यों किया गया? किस कारण से कम दिया? 

अकाउंटेंट ने गोयल साहब से बात करने को कहा. राजेंद्र कुमार ने तुरंत गोयल साहब से दरयाफ़्त की. गोयल साहब ने बताया - तुमने प्रीमियर के लिए दस सीटें अपनी फैमिली के लिए बुक करायीं थीं, उसी का पेमेंट लिया है. मेरी कंपनी में कुछ भी मुफ़्त नहीं मिलता है. हीरो को भी नहीं. उसूल तो उसूल है.  
राजेंद्र कुमार खून का घूँट पीकर रह गए. मन ही मन तुरंत निर्णय लिया,  ठीक है, मैं भी ऐसा ही उसूल बनाऊंगा. कालांतर में उनकी 'नाम' (1986) की शूटिंग देश-विदेश में हुई. फिल्म अच्छी बनी और खूब चली भी. हीरोइन अमृता सिंह को जब अपना मेहनताना मिला तो वो तय अमाउंट से कम था. उन्होंने वज़ह पूछी तो राजेंद्र कुमार ने बताया - हांगकांग के होटल रूम से तुमने अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को जो लम्बी-लम्बी कॉल की थीं, उसमें मोटा बिल आया था, वही काटा गया है. मुफ़्त में कुछ नहीं मिलता मेरी कंपनी में. मेरे साथ भी ऐसा ही सलूक हो चुका है. उसूल तो उसूल होता है.
- लेखक एक नामी फिल्म समीक्षक हैं

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