मीडिया Now - अंतरराष्ट्रीय उभयलिंगी दृश्यता दिवस पर खास : आइए इस ' भीष्म ' प्रतिज्ञा का साथ दें!

अंतरराष्ट्रीय उभयलिंगी दृश्यता दिवस पर खास : आइए इस ' भीष्म ' प्रतिज्ञा का साथ दें!

medianow 31-03-2021 18:56:36


अभयानंद कृष्ण / अपनी गली के नुक्कड़ पर निकलते, सड़क पर चलते, ट्रेन और बस में सफर करते या कभी किसी परचून की दुकान से सामान खरीदते खास लिबास और अंदाज के चलते एक आदमी से कट कर निकलने वाले हम लोग कभी अपना दो मिनट इनके हालात को समझने के लिए भी खर्चते हैं..? ईमानदारी से जवाब दें तो नहीं। जिन्हें सुबह सुबह देखना शुभ मानते हैं उन्हें हिजड़ा जैसा जलता संबोधन देकर खुद को खुद की दुनिया में लौटाते हम लोग कभी उनकी दुनिया को जानने की इच्छा तक नहीं रखते। लेकिन हमारे बीच कोई एक महेंद्र भीष्म भी होता है जिसकी तड़प से एक राह निकलती है। यह राह देश और समाज में किन्नर और हिजड़ा कहे जाने वाले लोगों को स्वीकार्यता की मंजिल पर पहुंचाने के लिए होती है। हालांकि यह राह हरगिज़ आसान नहीं होती। 

लखनऊ उच्च न्यायालय में नौकरी की अपनी स्वाभाविक व्यस्तता के बावजूद महेंद्र भीष्म करीब दस वर्षों से इस समुदाय के लिए लेखन, फिल्म, डॉक्यूमेंट्री और नाटक के साथ साथ सामुदायिक सहभागिता की कोशिशों में जुटे हैं। कहते हैं -  साहित्य में दलित और स्त्री चिंतन तो खूब दिखता है लेकिन समाज के इस हिस्से पर कभी किसी विमर्श की जरूरत नहीं महसूस की गई। याद करते हैं - 2012 में एक शोध हो रहा था। तीन या चार किताबें आई थीं तबतक. लेकिन उत्साहित हैं कि अभी तक करीब दो दर्जन उपन्यास लिखे जा चुके हैं। कई शोध हो चुके हैं और कई जारी हैं।

इस तथ्य से महेंद्र भीष्म की लिखी दो किताबें  किन्नर कथा और मैं पायल सहज ही जुड़ भी जाती हैं। एक राज परिवार में जन्म लिए थर्ड जेंडर की मार्मिक एक कहानी के उपन्यास रूप किन्नर कथा के जरिए महेंद्र भीष्म न सिर्फ इस कुदरती एक घटना का वैज्ञानिक विवेचना करने में सफल हैं बल्कि यह भी बताते हैं कि इन्हें लेकर समाज में किस कदर भ्रांतियां हैं. इनके नाम पर किस तरह वसूली के रैकेट फल फूल रहे हैं।


जाहिर है कि महेंद्र भीष्म के सामने संवेदना से उपजा पवित्र एक तकाजा है कि इन्हें सामाजिक सहभागिता में अलग नजर से न देखा जाए साथ ही एक चुनौती भी कि इनके नाम पर झूठा कारोबार इन्हें बदनाम कर के न चले। सच भी है आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2005 का एक शोध कहता है कि उस समय पूरे देश में थर्ड जेंडर की संख्या महज 554 थी। खुद को थर्ड जेंडर कहलाने वाले 2000 लोगों पर हुए मेडिकल टेस्ट के नतीजे और चौंकाने वाले आए। इनमें महज तीन ही वास्तविक थर्ड जेंडर निकले। स्पष्ट है कि सही अर्थों में थर्ड जेंडर विस्थापन की त्रासद जिंदगी के लिए काफी हद तक मजबूर हैं और दूसरी ओर एक और दुनिया देखी जा रही है।

इस चुनौतीपूर्ण समय में हर छ महीने पर अथ किन्नर कथा संवाद, इसी नाम से व्हाट्सएप एक ग्रुप और दुनिया भर में इनके लिए हो रहे प्रयासों से कदमताल करते महेंद्र भीष्म को यकीन है कि एक दिन ऐसा आएगा जब इन्हें समाज सहज रूप में मंजूर करेगा। कहते हैं - घर में कोई विकलांग बच्चा जन्म ले ले तो हम उसे दिव्यांग कहते हुए उसकी पढ़ाई और देखभाल के लिए अलग इंतजाम करते हैं फिर इन्हें विस्थापन का दर्द क्यों..? सरकार इन्हें लेकर गंभीर और सहयोगी है फिर हम क्यों नहीं?? खुद से जवाब देते हैं - यह सूरत शिक्षा से बदलेगी। विकसित देशों की तरह। अभी की मुश्किलें इन्हें मंजूर हैं क्योंकि आने वाले कल का एक सपना अब तमाम आंखों का हिस्सा हो चुका है।

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