मीडिया Now - अब छाती माथा कूटने से क्या मिलेगा...?

अब छाती माथा कूटने से क्या मिलेगा...?

medianow 29-04-2021 15:42:37


नवीन जैन, वरिष्ठ पत्रकार / इन दिनों एक ज्येष्ठ समाचार चैनल्स की वीडियो क्लिप्नगज बार बार दिखाई जा रही है। जाहिर सम्बन्धित एंकर सीनियर ही हैं। निशाना साधा जा रहा है भाजपा के नेताओं पर। मैं ,भाजपा ,तो क्या किसी पार्टी दबेलदार नहीं हूँ। जो इस नस्ल के भोंपू हैं ऐसा गंदा काम उन्हीं को मुबारक। मेरा सवाल उक्त एंकरों से है। इन्हें भी हालात बिगड़ते रहने के लिए समान रूप से जिम्मेदार क्यों न माना जाए। जब पश्चिम बंगाल सहित पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों के लाइव कवरेज क्यों दिखा रहे थे। उक्त सीधे प्रसारण के दौरान ही तो रैलियों, रोड शो, प्रचार के दौरान ही, तो कोविड अनुशासन के सभी नियम कायदे ,गाइडलाइंस ,वगैरह टूटे। इन सो कॉल्ड राष्ट्र भक्त चैनल्स का दायित्व बनता था कि अमेरिका के तीन वरिष्ठ चैनल्स की तरह आचरण करने का साहस दिखाते। किस्सा बड़ा अनुकरणीय है। इस सबसे पुराने लोकतंत्र के गए साल के अंत मे सम्पन्न आम चुनाव में तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सत्ता वापस हड़पने के लिए कभी अपनी ज़बान पर लगाम देना ठीक ही नहीं समझा। जब ट्रम एक, और शायद अंतिम रैली में जो बाइडेन के खिलाफ लगातार ज़हर उगलने की भी सीमाएँ लाँघने लगे, तो अमेरिका के ही तीन प्रमुख चैनल्स ने उनका सीधा प्रसारण तत्काल रोक दिया,औऱ फिर उसे कभी एडिट तक करके नहीं चलाया या दिखाया।

उसी दौरान उक्त चैनल्स भारत, और अमेरिका की जोड़ी में आधुनिक कृष्ण तथा सुदामा की अटूट दोस्ती देख रहे थे। चुनाव अमेरिका में हो रहे थे, और उक्त वरिष्ठ भारतीय चैनल्स ट्रम के लगभग समर्थन में ड्रम बीज रहे थे। आशय यह है कि यदि नमस्ते ट्रम, बिहार के विधानसभा चुनावों, अन्य कुछ राज्यों के विधानसभा उप चुनावों के उक्त प्रसारण को रोक दिया जाता, तो शायद देश में कोविड अनुशासन का पालन अधिक से अधिक सख्ती से अपने आप लागू होता।ज्ञान देने की बात नहीं है। और वैसे भी उक्त सीनियर एंकर्स परम् विद्वान हैं। इन्हें सिर्फ यह जानकारी देनी है कि मनोविज्ञान के अनुसार करीब प्रत्येक देश में बॉलीवुड, पॉलिटिक्स, और अब तो मीडिया सेलेब्रिटीज की लाइफ स्टाइल की नकल पूरा समाज करने को बेकरार रहता है। यही अमूमन भारत के हालिया हालात का दुखद उदाहरण है। इसी नस्ल के बार बार पाला बदलते रहने को मशहूर कई मुखबिर पत्रकार भी हैं। इन्हीं लोगों के एक विशेष की जमकर प्रवक्तागिरी की। ये लोग इसलिए अर्धज्ञानी साबित हो रहे हैं किसी धर्म के बारे में, और पार्टी के बुनियादी सिद्धातों के  बारे में कुछ नहीं जानते। सभी धर्म एक ही संदेश मानवता ,और अहिंसा का सन्देश देते हैं।

इनमें सबसे प्रखर ,तो  सनातन धर्म है ,जिसे साधारण भाषा में हिंदू धर्म ही कहा जाता है। गजब संयोग देखें कि सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या प्रकरण की सुनवाई के दौरान  हिंदुत्व को एक जीवन पद्धति तक माना था।इनमें सबसे प्रखर ,तो  सनातन धर्म है ,जिसे साधारण भाषा में हिंदू धर्म ही कहा जाता है ।गजब संयोग देखें कि सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या प्रकरण की सुनवाई के दौरान  हिंदुत्व को एक जीवन पद्धति तक माना था।इस नस्ल के रंग बदलने वाले पत्रकार क्या स्व. टी . एन . शेषन ,और लिंगदोह का नाम नहीं जानते ? शेषन मुँहफट या ब्लंट माने गए ,लेकिन अपनी छवि की उन्हें पड़ी थी ।उन्होंने आज तक ,और दशकों तक याद रखी जाने वाली मतदाता परिचय की अनिवार्यता कायम की। बदले में उन्हें सम्बोधन दिया गया ,शेषन का टेंशन । यह सम्बोधन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने ही दिया था कि। वजह थी तमाम चुनावी भ्र्ष्ट नेता या तो ऊपर भगवान से डरते थे ,या इन मुख्य चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषन से ।शेषन का अजर अमर जुमला था मैं, इस तरह के नेताओं को नाश्ते में खाता हूँ। शेषन को मुख्यमंत्रियोँ ने पागल कहा ,काला भैंसवा को गंगा में बहा देने की बात कही। लिंगदोह ने इसी प्रथा को कायम रखने की हर सम्भव कोशिश की।

अब उक्त तमाम पत्रकार चुनाव आयोग की इस नागवार भूमिका पर लानतें भेज रहे है,लेकिन चुनाव प्रचार को महिमा मंडित करने जैसा काम कर रहे थे। अब छाती माथा कूटने से क्या मिलेगा भला ? एक झूठ जब जब लगातार बोला जाता है ,तो सुनने ,और देखने वालों के पास उसे ही सच मान लेने के सिवा चारा नहीं रहता। यही उक्त कार्यक्रमों में लम्बे समय से हो रहा है। प्रत्येक पार्टी के पास कई प्रवक्ता होते हैं । क्या ज़रूरी है कि हरेक मुद्दे पर एक ही प्रवक्ता की बातें सुनी जाएँ। लग रहा कि सम्बंधित प्रवक्ता गुमराह कर रहा ,तो उसे भी ,तो बायकॉट या ब्लैक आउट किया जा कर किसी अन्य प्रवक्ता की माँग की जा सकती है।ऐसे मंज़र में हरदम आशंका बनी रहती है कि आपके चैनल ,औऱ पार्टी विशेष के बीच झूठ को सच का वर्क चढ़ाकर पेश करते रहने का गोपनीय समझौता हो चुका है।आखिर सूटेड बूटेड , कई विदेशी ,और कीमती गाड़ियों का कारवां ,महलों जैसे बंगले ,विदेशी यात्राएँ  ,करोड़ों के पैकेज सभी को सुहाता है । मुझे भी ,हाँ मुझे भी ,तो ,मग़र एक सवाल हम सभी पत्रकारों को अपने से पूछना चाहिए कि जब देश प्रलय की कगार पर खड़ा है ,तब भी अपने हितों के हाथ लेने को जिम्मेदार पत्रकारिता कतई नहीं जा सकती ।

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