मीडिया Now - मोदी सरकार चाहे तो रेमडेसिविर बेहद सस्ते दाम पर आसानी से उपलब्ध हो सकती है

मोदी सरकार चाहे तो रेमडेसिविर बेहद सस्ते दाम पर आसानी से उपलब्ध हो सकती है

medianow 29-04-2021 20:19:12


गिरीश मालवीय / क्या आप जानते हैं कि कोरोना की दवा रेमडेसिविर बेहद सस्ते दाम पर देश की जनता को बड़ी मात्रा में बहुत आसानी से उपलब्ध हो सकती है लेकिन बस मोदी सरकार चाहे तो !....रेमडेसिविर के लिए पूरे देश मे त्राहि त्राहि मची हुई है, लोग किसी भी कीमत पर इसे पाने को आतुर है,मरीज के परिजन इसके लिए किसी नेता अधिकारी के पैर तक पड़ने के लिए तैयार है....रेमडेसिविर की लागत 1 डॉलर से भी कम है यह मैं नही कह रहा हूँ ।.....यह तथ्य लिवरपूल विश्वविद्यालय में एक वरिष्ठ रिसर्च फैलो एंड्रयू हिल द्वारा किए गए एक अध्ययन में सामने आया है जिन्होंने पाया है कि दवा एक डॉलर प्रति शीशी से कम में बनाई जा सकती है. यानी यदि दो गुना मार्जिन भी जोड़ ले तो बड़ी आसानी से यह इंजेक्शन 250 रू मात्र में एक आदमी को मिल सकता है

जी हाँ !... जिस 1 इंजेक्शन के दाम आप आज पचास हजार तक चुकाने के लिए तैयार है वह सिर्फ ढाई सौ रु कीमत रखता है.......तो हमे यह मिलता क्यो नही ? यही सवाल आपके दिमाग मे आ रहा है न ! दरअसल रेमडेसिविर का पेटेंट गिलियड साइंस कम्पनी के पास है जो एक अमेरिकन कम्पनी हैं यह कम्पनी महँगी दवाईयों को बेचने में कुख्यात है...... इस रेमेडिसवीर को मूल रूप से इबोला के लिए निर्मित किया गया था.........भारत जेनेरिक दवाओ का बहुत बड़ा निर्माता हैं..... वह रेमडेसिविर भी बहुत आसानी से बना सकता था।...... यदि उसने भारत मे गिलियड साइंस का पेटेंट न स्वीकार किया होता तो ! आपको जानकर बेहद आश्चर्य होगा जब आप यह जानेंगे कि भारत मे रेमडेसिविर का यह पेटेंट गिलियड साइंस कम्पनी को कब दिया गया !......
यह तारीख है 20 फरवरी 2020 ! जी हाँ !....भारत मे कोरोना महामारी शुरू होने से ठीक एक महीना पहले, 

याद है न 22 मार्च 2020 को पहला जनता कर्फ्यू लगा था.....अब इसमें कांस्पिरेसी ढूंढिए या मत ढूंढिए,  यह तथ्य तो बदलने वाला है नही !......सब जानते हैं कि जनवरी 2020 में ही चीन में जब यह महामारी फैली थी तब ही इस दवा के टेस्ट कोरोना मरीजो पर कर लिये गए थे...... यानी मोटा मुनाफा कमाने का खेल गिलियड के हाथो में था उसे बस भारत मे पेटेंट हासिल करना था. अगर मोदी सरकार में जरा अकल होती उसने जरा सी भी दूरंदेशी से काम लिया होता तो वह 20 फरवरी 2020 को गिलियड को पेटेंट देती ही नही !......लेकिन फार्मा कम्पनियो को तो आप जानते ही है .....ओर इस सरकार के  बड़बोलेपन को भी.......एक ओर मजे की बात जान लीजिए...... मोदी सरकार चाहती तो साल भर में इस पेटेंट को भी एक झटके में निरस्त कर सकती थी......आज भी कर सकती है !..

पेटेंट कानून के प्रावधान के तहत, 'कोई देश पेटेंट के मालिक की सहमति के बगैर मैन्युफैक्चरर को किसी खास ड्रग के उत्पादन की अनुमति दे सकता है. सरकार के पास सार्वजनिक हित में पेटेंट को रद्द करने की शक्ति होती है, उसे बस इतना करना होगा कि पेटेंट धारक को एक बार सुनने का अवसर दें और आधिकारिक राजपत्र में उस आशय की घोषणा करें और उसके बाद पेटेंट को निरस्त माना जा सकता है,"

धारा भी बता देता हूँ ....भारत के पेटेंट क़ानून के क्लॉज 92 के अनुसार भारत इस दवा के उत्पादन की इजाज़त भारतीय कंपनियों को दे सकती है. भारत के जेनेरिक दवा उत्पादकों के पास आसानी से इतनी क्षमता है कि वो रेमडेसीविर का जेनेरिक वर्जन का उत्पादन कर सकें. अब आप पूछेंगे कि अब तक किसी ने इसकी मांग क्यो नही की !.......तो भाई माँग भी की.... लेकिन आपके बिकाऊ मीडिया चैनलों ने जो फार्मा कम्पनियो की दलाली करते हैं उन्होंने यह सारे फैक्ट आपको एक बार भी बताना जरूरी नही समझे .....

भारत के एक संगठन  Cancer Patients Aid Association CPAA ने फरवरी 2020 में ही कहा था कि गिलियड साइंस को इस  दवा को दिए गए पेटेंट को नवीनता और आविष्कारशीलता की कमी के कारण निरस्त किए जाने की आवश्यकता हैं, सीपीएए ने सरकार से अनुरोध किया है कि वह एक रेमेडिसविर कंपाउंड में गिलियड को दिए गए पेटेंट को रद्द करे।

CPAA ऐसे मुकदमे पहले भी लड़ चुका है है.CPAA ने संशोधित पेटेंट अधिनियम (2005) के तहत देश की पहली फार्मा पेटेंट मुकदमेबाजी में एक केंद्रीय भूमिका निभाई थी जिसमें नोवार्टिस की रक्त कैंसर दवा Glivec शामिल थी। Doctors Without Borders  जैसे प्रतिष्ठित समूह ने भी रेमडेसिवीर पर गिलियड के पेटेंट का विरोध किया था इस समूह का कहना है कि दुनियाभर में आई स्वास्थ्य इमरजेंसी के बीच इस तरह के लाइसेंसिंग समझौते स्वीकार्य नहीं किये जाने चाहिए......लेकिन चाहे लाखो लोग मर जाए किसे फिक्र है !.....न फार्मा कम्पनियो को फिक्र है ......न सरकार को फिक्र है !.... न मीडिया को फिक्र है....वैसे भी जो अंधी बहरी गूँगी जनता जो अपने हक के लिए आवाज नही उठा सकती उसका मरना ही श्रेयस्कर होगा !.....
- लेखक एक नामी समीक्षक हैं

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