मीडिया Now - दीदी के लिए क्या स्थिति चिड़िया चुग गई खेत जैसी हो गई

दीदी के लिए क्या स्थिति चिड़िया चुग गई खेत जैसी हो गई

medianow 01-04-2021 14:38:43


नवीन जैन / क्या वाकई ऐसा ही होने जा रहा है ? तृणमूल कांग्रेस के चुनावी  रणनीतिकार  कुमार प्रशान्त ही कह रहे हैं कि टीएमसी पश्चिम बंगाल में चुनाव में हारने जा रही है। यही नहीं ,मुख्यमंत्री, और पार्टी सुप्रीमो ममता बैनर्जी भी हारने जा रही हैं। ममता दीदी नन्दीग्राम सीट से लड़ रही है ,और उनके विरूद्ध टीएमसी से कदाचित सबसे पहले बग़ावत कर चुके शुभेंदु अधिकारी भाजपा के टिकट पर मैदान में हैं।मज़ेदार बात यह है कि चुनावी रणनीति में गहरी पैठ रखने के लिए मशहूर प्रशान्त किशोर ऊर्फ़ पीके ने कुछ दिनों पहले ही एक बेहद चर्चित बयान दिया था। उन्होंने सार्वजनिक रूप से दावा किया था कि दीदी के सूबे में यदि भाजपा को सौ सीटें भी मिल गईं तो वे अपनी कम्पनी बंद कर देंगे।

सनद रहे कि पीके चुनावी रणनीति की एक कम्पनी के सर्वेसर्वा हैं। उन्हें उक्त चुनावों के बाद पंजाब के मुख्यमंत्री केप्टन अमरिंदर सिंह ने अपना सलाहकार बना लिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार उन्हें मंत्री पद की शानों शौकत हासिल होगी। वे वेतन  प्रति माह एक रुपया ही लेंगे। नन्दीग्राम देस दुनिया के लिए सबसे हॉट सीट मानी जा रही है, जहाँ अंतरराष्ट्रीय मीडिया का मेला लगा हुआ है। इस सीट से ममता बैनर्जी ने ज़मीन आसमान ही एक नहीं कर दिया बल्कि व्हीलचेयर पर गली गली ख़ाक छान ली है। वे कई दिनों से यहीं डटी रही, जहाँ कुल मतदाताओं की संख्या ढाई लाख के ज्यादा बताई जाती है। इनमें मुस्लिम की संख्या बासठ हज़ार के आस पास है। उथला उथला मतलब निकालें, तो यह वोट बैंक ममता बैनर्जी की सालों से जागीर रहा है, क्योंकि ममता दीदी ने उन्हें सुरक्षा कवच दे रखा है। मीडिया में चर्चा आम है कि शायद इसी कारण से यहाँ साम्प्रदायिक सौहार्द बना रहा।

उधर, भाजपा के शुभेनदु अधिकारी इसी सीट से 2016 का विधानसभा चुनाव एक लाख बासठ हज़ार वोटों से जीते थे, लेकिन वे तब टीएमसी के प्रत्याशी थे। इस सीट पर माकपा ने मीनाक्षी मुख़र्जी को लड़वाया है। कई विश्लेषक मानते रहे हैं कि टीएमसी के प्रत्याशी होने के कारण ही शुभेन्दु अधिकारी लोगों की नज़रों में इतना चढ़ पाए थे, और तमाम विकास कार्य भी उन्हीं की वजह से हुए। कोई भी चुनाव हो ,व्यक्ति विशेष को ही ध्यान में  नहीं रखा जाता, बल्कि उसकी पार्टी, एवं व्यक्तिगत आचरण पर भी नज़रें रखी जाती हैं। यदि अति उत्साह में शुभेन्दु को जितवा दिया गया, और लगातार तीसरी बार भी टीएमसी की सरकार ही बन गई, तो ममता दीदी का नज़ला नन्दीग्राम पर गिर सकता है। सनद रहे कि नन्दीग्राम के अलावा कुछ अन्य सीटों पर आज यानी एक अप्रैल को वोटिंग होगा।कम्युनिस्टों के ज़माने में एक तरह से शस्त्रागार माने जाने वाले इस  इलाके में भाजपा के तमाम स्टार प्रचारक टूट पड़े, जिनकी अगुवाई गृह मंत्री अमित शाह ने की। कहा गया है कि इस सीट से यदि दीदी पराजित हो गईं, तो पश्चिम बंगाल फिर सोनार बांग्ला बन जाएगा। टीएमसी के सभी नेता प्रशान्त किशोर के दावे को खारिज कर रहे हैं, मगर पीके के सर्वे पर भी ध्यान देना होगा। उनका कहना है कि इस राज्य में भी पीएम नरेंद्र मोदी  की लोकप्रियता में कमी नहीं आई है।

प्रसिद्ध राजनीतिक विश्लेषक प्रदीप सिंह ने ममता दीदी की ताज़ा स्थिति को हिंदी के नामवर ग़ज़लगो स्व. दुष्यंतकुमार त्यागी के शेर के मार्फ़त बयान किया है । उक्त शेर है ,तुम्हारे पाँव के नीचे की कोई ज़मीन नहीं, कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं। सीएसडीएस के सर्वे में पाया गया है कि आज भाजपा के दलितों का समर्थन 21 से बढ़कर 65 फ़ीसद हो गया है।दलित समुदाय में यह प्रतिशत 20 से  बढ़कर 61 हो गया है।आदिवासियों का यह आंकड़ा 11 से बढ़कर 58  हो गया है।हार्वर्ड  विश्वविद्यालय से जुड़े अयान गुहा का कहना है कि बीते कुछ सालों के  दौरान बंगाल की राजनीति में भाजपा के साथ नरेन्द्र मोदी का प्रवेश हो गया। पिछड़े, दलित के साथ ही आदिवासियों को भाजपा के ज़रिए नई आवाज मिल गई। गृह मंत्री अमित शाह का आदिवासियों के घर घर जाकर उनके साथ ही भोजन करने की ट्रिक ने भी आदिवासियों का मिज़ाज बदला। जैसा कि पहले भी हवाला दिया जा चुका है मतुआ महासंघ सूबे की लगभग 70  सीटों के नतीजों में सेंध लगा सकता है।

यह मतवाला समुदाय भाजपा को माई बाप भी मानने लगा है ,क्योकि इस समुदाय को शीघ्र भारत की नागरिकता की दरकार है। ममता बैनर्जी इसी नब्ज़ को पकड़ नहीं पाई। दीदी ने सीएए, और एनसीआर कानूनों के विरोध में आसमान सिर माथे उठाने लिया जबकि उन्हें न जाने क्यों पता ही नहीं चला कि मतुआ समुदाय के दिल में क्या है?अब तो हालत चिड़िया चुग गई खेत जैसी हो गई है। दीदी ने हर सम्भव नुस्खे अपनाए। यह जानकारी तो पहले कभी मिली नहीं कि वे मन्दिर जाती हैं। पूजा पाठ में भी आस्था रखती हैं ,लेकिन ऐन चुनावों के मौके पर उन्होंने मंदिरों के दर्शन भी किए, प्रभु श्री राम के जयकारे भी लगाए, चंडीपाठ करवाए, अपने ब्राह्मण कुल की गोत्र तक बताई ,लेकिन खेलों की टर्मिनोलॉजी में माना गया कि वे टाइमिंग्स चूक गईं।

ममता बेनर्जी की यह राजनीतिक नादानी ही मानी जा रही है कि 2011 में कम्युनिस्टों को हटाकर जब वे पहली बार मुख्यमंत्री बनी थीं ,तो इस ख़ुशफ़हमी में रह गईं कि भाजपा के लिए तो उनके राज्य में कोई खिड़की भी लोगों ने नहीं खुली रखी है। भाजपा आना भी चाहे तो उसे ममता से रसीद कटानी पड़ेगी। यह संकुचित सोच उन्हें पहली बार तब बहुत भारी पड़ी जब 2019 के लोकसभा इलेक्शन में बंगाल की कुल 42 सीटों में से भाजपा को 18 सीटें मिल गई।यह कोई जादू टोने से नहीं हुआ, बल्कि भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव, बंगाल के इंचार्ज, और इन्दौर के मूल निवासी कैलाश विजयवर्गीय की प्रयोग शीलता के कारण हुआ। संयोग ही है विजयवर्गीय कोलकाता के दामाद हैं ।
- लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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