मीडिया Now - आज खबरों में दो लोगो की मृत्यु की सूचना है, एक का कद ओसत था तो एक कद बहुत ही बड़ा

आज खबरों में दो लोगो की मृत्यु की सूचना है, एक का कद ओसत था तो एक कद बहुत ही बड़ा

Administrator 01-05-2021 10:27:15


गिरीश मालवीय / पूरा सोशल मीडिया उआज खबरों में दो लोगो की मृत्यु की सूचना है एक का कद ओसत था ओर एक कद बहुत ही बड़ा लेकिन आप देखिए कि ओसत से कद वाले व्यक्ति के पीछे लट पड़ा है......दूसरे व्यक्ति के बारे में कोई बात भी नही कर रहा. पहले व्यक्ति को आप सब जानते हैं लेकिन वो जो दूसरा व्यक्ति आज हमारे बीच से चला गया है उसने इस देश की अमूल्य सेवा की है....... हम बात कर रहे हैं सोली सोराबजी की जिन्होंने अपनी वकालत से स्वंय को अभिव्यक्ति की आजादी के प्रहरी के रूप में स्थापित किया.

सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने कई लैंडमार्क केसों में प्रेस की आजादी की भी रक्षा की और भारत में प्रकाशन पर से सेंसरशिप ऑर्डर और प्रतिबंध को हटाने के लिए उनकी भूमिका बड़ी है. मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी के रक्षा के उनके प्रयासों के लिए उन्हें मार्च 2002 में भारत का दूसरा सबसे बड़ा पुरस्कार ,पद्म विभूषण से नवाजा गया था. वे सिटीजन्स जस्टिस कमेटी ऑफ 1984 एंटी सिख राइट्स’ के सदस्य भी थे और उन्होंने पीड़ितों की तरफ से प्रो-बोनो (बिना फीस) केस भी लड़ा था.

मित्र Virag Gupta ने न्यूज़ 18 पर लिखे एक लेख में उन्हें श्रध्दांजलि देते हुए लिखा है 
'आजादी के बाद संवैधानिक मूल्यों की रक्षा और अभिव्यक्ति की आजादी सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बनी, जिसके लिए सोराबजी जैसे लोग सबसे बड़े संरक्षक बने. 68 साल की वकालत के अनुभव वाले सोली सोराबजी भारत में संविधान का पर्याय सा बन गए थे. कोरोना ने लाखों लोगों की बलि ले ली लेकिन सोराबजी का निधन संविधान के प्रकाश स्तंभ के बुझ जाने कैसा है.
 
देश में अन्य क्षेत्रों की तरह न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार बढ़ा है. लेकिन सोराबजी आखिरी समय तक नैतिक मूल्यों के साथ समझौता किये बगैर समाज और न्याय के हित में अपना योगदान देते रहे. भारत में संविधान की अलख जगाने वाले सोराबजी, मानवाधिकार और अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा जैसे संजीदे मामलों में संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) की मदद के लिए भी हमेशा आगे रहे.

संविधान बनने के बाद सुप्रीम कोर्ट में सबसे ऐतिहासिक फैसला केशवानंद भारती मामले में सन 1973 में आया. 13 जजों के उस फैसले से देश की राजनीति के साथ संसदीय व्यवस्था की तकदीर भी बदल गयी. उस मुक़दमे में सीनियर एडवोकेट के तौर पर सोराबजी का बड़ा योगदान था. उस फैसले के बाद संविधान के बेसिक ढांचे का सिद्धांत लागू हुआ, जिससे सरकार, संसद और अदालतों की लक्ष्मण रेखा तय हुई. उनकी विद्वता और योगदान को देखते हुए इमरजेंसी के बाद जनता पार्टी सरकार ने उन्हें देश का सॉलिसिटर जनरल बनाया. उसके बाद से बंबई की बजाय देश की राजधानी दिल्ली ही उनका केंद्र बन बन गयी. वीपी सिंह और फिर अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार में वह देश के अटॉर्नी जनरल बने. मित्रों में सोली नाम से प्रख्यात सोराबजी व्यक्तिगत जीवन में बेहद विनम्र, मृदुभाषी और दयालु थे.

अभिव्यक्ति की आजादी और मानवाधिकार के क्षेत्र में सोराबजी के योगदान को देखते हुए देश ने उन्हें पद्म विभूषण से नवाजा. देश में सफल और योग्य लोगों की कमी नहीं है लेकिन सोराबजी के व्यक्तित्व में योग्यता, अनुभव और निडरता की त्रिवेणी का अद्भुत समागम था। अदालतों के साथ टीवी परिचर्चा में भी वो अपनी वजनदार बातों को बड़े सलीके से रखते थे. उनकी लिखी किताबें क़ानून के विद्यार्थियों के लिए बहुमूल्य दस्तावेज सरीखी हैं. शालीन व्यक्तित्व के धनी सोराबजी बड़े पदों से जुड़े रहने के बावजूद राजनीतिक प्रपंचों से दूर रहे. इसीलिए देश के सामने कठिन चुनौतियां आने पर वे निडरता से संविधान और अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात पूरे देश के सामने रख पाए. उनकी मासूम बुजुर्गियत की छाँव में संविधान के मूल्य सुरक्षित से महसूस होते थे. इसलिए उनके जाने से संविधान के एक बड़े प्रकाश स्तम्भ का अवसान हुआ सा लगता है.

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