मीडिया Now - मौत के अँधेरे आसमान में ज़िंदगी के सितारे की तलाश

मौत के अँधेरे आसमान में ज़िंदगी के सितारे की तलाश

medianow 01-05-2021 10:45:00


डॉ. कृति गर्ग ,स्वतंत्र पत्रकार (ऑस्ट्रेलिया) 

हिंदी ,अंग्रेजी ,मराठी ,और  गुजराती के वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग की बिटिया कृति गर्ग स्वयं भी स्वतंत्र पत्रकार हैं। वे ,ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में मुख रोग सर्जन हैं ,मग़र वहाँ  के विश्वनीय अखबार द गार्जियन में नियमित रूप से लिखती भी हैं। इन दिनों कृति गर्ग का का मार्मिक लेख भारत में भी खूब वायरल हो रहा है । इस लेख में एक भारतीय महिला की छटपटाहट ,और संवेदना स्पष्ट झलकती है। कोविड काल में अपने वतन की दुर्दशा देखकर कृति महज भावुक नहीं हो रही हैं, बल्कि भारत के ज़रूरत मंद कोरोना पीड़ितों के लिए आर्थिक सहायता की अपील भी कह रही हैं । उनका कहना है कि जो लोग इन असहाय लोगों की आर्थिक मदद करना चाहते हैं।

 सुश्री कृति का कहना है कि भारत में  सोशल मीडिया पर मेरी चैट होती रहती है, मग़र इन दिनों ,तो औफ ! कोई सकारात्मक बात हो ही नहीं रही।सभी लोग अस्पताल में बेड, ऑक्सीजन, प्लाज़मा, रेमेडिसिवर, वेंटीलेटर, दवाओं की अपने रिश्तेदारों, मित्र, परिचितों से जुटाने के निवेदन करते करते थक गए। मौतों का ऐसा हौलनाक मंज़र कभी न देखा ,न सुना। यह पहली बार हो रहा है। फुटपाथों पर ही दाह संस्कार हो रहे हैं। कृति ने इस सम्बंध में कई उदाहरण दिए हैं। कृति ने बेहद अनुकरणीय बात यह कही है ,कि ऑस्ट्रेलिया में संक्रमण इसलिए तत्काल काबू पा लिया क्योंकि वहाँ क्वार नटाइन का सख्ती से पालन करवाया गया । विचारणीय बात यह है कि भारत के लोग भी इसी तरह की एहतियात बरतते ,तो शायद संक्रमण के बाद मौतों के आंकड़ों में ऐसा दहशत फैलाने वाला उछाल नहीं आता।उक्त महिला ने अपनी व्यथा यूँ ज़ाहिर की है ,मैं यहाँ बेलबर्न में सुरक्षित ,और स्वस्थ बैठी हुई हूँ ,मग़र लाचार ,स्तब्ध हूँ। इससे बुरा अनुभव मेरे लिए क्या हो सकता है ,कि मैंने जिस भारत की माटी में जन्म लिया ,वहीं के हमवतनों के हित में मैं कुछ नहीं कर पा रही हूँ ।उक्त महिला पत्रकार ने स्पष्ट माना है ,कि मेरी माताजी हरदम पीएम नरेंद्र मोदी में ही खड़ी रहीं ।पिछले सात सालों में उन्होंने हरेक मुद्दे पर बेखटके मोदी कासाथ दिया ,लेकिन वे भी मेरे पिताजी के लिखे के सही अर्थ को समझने लगी हैं। मेरे पिता निडर ,और निष्पक्ष के लिए जाने जाते हैं। मेरी मम्मी ऐतबार होने लगा है मोदी करके वे गलत कर रही थीं ।अपने एक सहपाठी नई दिल्ली स्तिथ का अनुभव शेयर करते हुए  बात करते वक्त उसका गला बैठ रहा था। उसने अपने एक बिना एम्बुलेंस के मृत हुए पड़ोसी की दास्तान सुनाई  । उस कोविड मरीज को कोई मेडिकल सहायता नहीं मिल पाई ।उक्त डॉकटर कुलीग डॉक्टर ने डॉ. कृति को बताया कि जब मरीज फूटपाथ पर उक्त डॉक्टर ने ही नब्ज़ टटोली,और दोनों आँखों में टार्च की रोशनी फेंकी , तब तक काफी देर हो चुकी थी।कृति के रिशेतदार उन्हें बता रहे हैं कि श्मशान घाटों इतनी लाशों का दाह संस्कार हो रहा है ,कि वहाँ से अब प्राथर्ना सभाओं  की आवाज़ आनी बंद हो गई है।उन्होंने बताया कि अन्य रोगों के मरीजों के इलाज के ,तो पते ही नहीं है । इनके लिए न अस्पताल।जो लोग अस्थमा बीमारी की ज़द में थे ,वे कोविड संक्रमित हो गए हैं।कृति कह रही हैं कि मेरे विचार से भारत में शायद ही कोई परिवार होगा ,जो कोविड संक्रमित नहीं होगा।

कृति को  अपने एक डॉक्टर चाचा ने यहाँ तक कह दिया कि अब ,तो फ़ूटपाथों पर ही कहीं बेड न लगवाने पड़ जाएँ।कृति के रिश्ते के भाई ,भतीजे ,भतीजी कोरोना को राक्षस कहने लगे हैं ,क्योंकि क्ररीब सवा साल से स्कूल कॉलेज ही नहीं जा पा रहे हैं।दूरस्थ  स्तिथ जिन गांवों में इंटरनेट नहीं पंहुचा है,वहाँ की कल्पना से ही शरीर में कांटे चुभने लगते है। डॉक्टर कृति गर्ग का कहना है कि मेरी पापा से फ़ोन पर चर्चा होती है ,तो अक्सर उनका गला भारी होने लगता है उनके कई सहकर्मी ,बचपन के दोस्त ,इन्दौर में आस पड़ोसी भी जाते रहे। फ़िर भी पापा का हौसला दरका नहीं है। माताजी के साथ वे स्वयं अपनी सेहत का पूरा ध्यान रखे हुए हैं ।जान लें कि श्रवणजी करीब 77 वर्ष की इस उम्र में भी एक लेख रोज़ लिखते हैं। विभिन्न चैनल्स पर आते हैं। उनका बेटा अमेरिका में बस गया है।डॉ. कृति ने लिखा है ,कि मुझे ,तो लॉक डाउन में रहने की आदत पड़ गई है। आस्ट्रेलिया में N 95 मास्क ही चलन में हैं। उनका मानना है कि हालात को बिगाड़ने में नागरिकों की नासमझी भी जिम्मेदार है । इन लोगों को चुनावी रैलियों, रोड शोज़, प्रचार, शादियों, रीयूनियन, मिलन समारोह में न जाने की शपथ खा ली लेनी थी। मेरे माता पिता अकेले रहते हैं । कहीं बाहर नहीं निकलते।  बावजूद इसके ,डॉ. कृति लिखती हैं ,बहुत जल्दी ही कोई खुश खबर मिले ।

 हिंदी अनुवाद ,नवीन जैन ,स्वतंत्र पत्रकार

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